शनिवार, 21 जुलाई 2018

माना कि यह डर जाने का समय......

माना कि यह डर जाने का समय है प्रियवर, लेकिन सचमुच इतना भी डर जाने का समय नहीं है!

त्रिभुवन
माना कि यह डर जाने का समय है प्रियवर, लेकिन इतना भी डर जाने का समय नहीं है! अभी इतना भी अंधियारा नहीं हुआ है कि हम अपने रक्त का एक दीप भी प्रज्वलित नहीं कर सकें। सचमुच इतना भी डर जाने का समय नहीं है ये। वे अगर आपके रक्त का आचमन करने को आतुर हैं तो आप कम से कम अपने रक्त से दीपक जलाकर कुछ अंधेरा तो दूर कर ही सकते हैं। आप अगर अपने रक्त के दीप जलाने को तैयार हो जाएंगे तो चांद उगेंगे और सारा तमस छंट जाएगा।

यह ख़बर बिलकुल सही है कि इतिहास, धर्मशास्त्र, राजनीति शास्त्र, भौतिकविज्ञान, रसायन शास्त्र, त्रिकोणमिति, कैलकुलस, बुद्धिशास्त्र और शिक्षा विज्ञान का मूल्यांकन अब आतंकवादी कर रहे हैं। आप यह मत कहिए कि यह श्रेणियों या मर्यादाओं का ज्ञान भर नहीं है। आप यह भी मत कहिए कि यह केटेगरी मिस्टेक है।

यह ख़बर भी बिलकुल सही है कि मंदिरों में घंटियों की जगह अब झिंगुरों की आवाज़ें आने लगी हैं। गुरुद्वारों में ग्रंथसाहब को एक बहुत ही शालीन रेशमी चादर से ढंक दिया गया है। मस्ज़िदों की अज़ान बम धमाकों में लुप्त हो रही हैं। गिरजाघरों के इर्दगिर्द नन्ही बालिकाओं की चीखें दब गई हैं। जैसे देवत्व की प्रतिमाएं लुप्त हो गई हैं और धरती पर हर जगह विभिन्न रंगों के झींगुरों की आवाज़ें गूंज रही हैं।

मैं एक बार फिर कहूंगा कि दमकता हुआ चंद्रमा फिर छुप गया है नभ में कहीं और बूढ़े सितारों को सड़क पर लाकर फेंका जा रहा है। प्रश्नाकुल मन के साथ सांस्कृतिक मर्यादाओं और कर्तव्यनिष्ठाओं के सुर्ख फूल अत्याचारों के बोझ से कुम्हला गए हैं। वाक़ई यह अंधियारा समय है प्रिय, क्योंकि विशुद्ध और निष्पाप विद्वत्ता वाले इतिहासकारों के मुंह को आंसुओं से धोने का मौसम है। यह झूठों, मिथकों और अर्धसत्यों को राष्ट्रीय अस्मिता बना देने और बहेलियों को राष्ट्रीय गौरव बना देने का कालखंड है। यह कला, दर्शन, संगीत, साहित्य, चित्रकला और इतिहास की गतिविधियों का समय नहीं, यह बौद्धिक रूप दरिद्र हो जाने, बेहूदा विचारों को आत्मसात करके नृत्यरत होने और अपने भीतर के जंगलीपन पर गर्व करने का युग है, प्रियवर!

हमने इस धरती पर फ़ैसला कर लिया है कि उत्पीड़न हमारा धर्म है और इस धर्म के सब मंत्र डार्क मेटल के संगीत से लयबद्ध होंगे। यह आँसुओं में भीगी कारुणिक पुकारों की ऋतु है। यह लाठियों, बंदूकों और स्टेनगनों का पर्व है। मुसीबतों की मोहिनियां बुलाने के लिए मूर्खों, मतांधों, अंधभक्तों, दुराचारियों, हुड़दंगियों और धर्म के नाम पर हत्या करने वालों के स्वागत में करबद्ध खड़े हम अपने विनाश का महामंत्र पढ़ रहे हैं। अब हमें वेदों, उपनिषदों, षडदर्शन आदि के विलक्षण ज्ञान, शंकराचार्य या ब्रह्मगुप्त की अदभुत बौद्धिकता, भास, भारवि, शूद्रक या कालिदास के काव्यवैभव पर गर्व नहीं है। अब हमें भगवद् गीता या रामायण के मूल्य नहीं, राम का धनुष, कृष्ण का सुदर्शन चक्र और हनुमान की गदा प्रिय है, प्रियवर। हम राम के सत्ता से मुंह फेर लेने वाले मर्यादित जीवन को भूल गए हैं। हमें कृष्ण के प्रेम से कोई लेना देना नहीं है। हमारे हृदयों में सेवाभाविता का कोई दीप नहीं जल रहा है।

यह टैंकों, तोपों, बंदूकों और बैलेस्टिक मिसाइलों का त्योहार है। अब युद्ध विनाश नहीं, विकास के नाम पर मनाया जा रहा एक उत्सव है। यह कायर लोगों का समय है। यह हैरान चेहरों और परेशान देहों का घुप अंधेरा है। यह ऐसी अंधेरी गली है, जिसमें अस्सी साल के एक संन्यासी को जूतों के तल्लों से लतियाया जा रहा है और विवेकशीलता की कोंपले खिलाने वाले बौद्धिकों की हत्याएं की जा रही हैं, जिन पर शासन, प्रशासन और धर्म का लबादा ओढ़े जंबूक इस धरती के क्षितिज पर चढ़ कर हुआँ-हुआँ कर रहे हैं। यह ऐसा कालखंड है कि ऋषि-मुनियों की संतानें उत्पाती हमलावर महमूद गजनी का अाचरण आत्मसात करने को व्याकुल हैं। यह जाने बिना कि उग्र रूढ़िवाद और प्रचंड मतांधता पैदा करके कुछ चालाक लोग अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस धरती के लोगों के भोलेपन का इस्तेमाल कर रहे हैं और उनकी संतानों को ही नहीं, इस समूचे भूखंड को मतांधता के घटाटोप में लाकर छोड़ने जा रहे हैं।

जिसे तुम अपने सपनों का राजकुमार समझ रहे हो, वह दरअसल एक ख़तरनाक़ घुसपैठिया है, जो इस बार तुम्हारी चेतना में सोते हुए प्रवेश कर गया है और उस प्रहरी की मुद्रा में आ गया है, जो असल में तुम्हारे स्वप्नलोक की हत्या के लिए भेजा गया है। इसलिए तुम उन सभी स्वामिभक्त कुत्तों पर भी ग़ाैर करो, जो हादसों और वारदातों के समय भौंकना भूल जाते हैं और हत्यारे का मुंह चाटने लगते हैं। यह बहुलतावाद, सहनशीलता और धर्मनिरपेक्षता के वैविध्य को नष्ट करने और दिक् और काल में हिंसा, अन्याय और तानाशाहियां चिन देने का समय है। अब यह योग, सांख्य, न्याय, वेदांत, वैशेषिक और मीमांसा का समय नहीं है। अब नए दर्शन का केंद्रीय तत्व घृणा है और अपनी भीतरी पवित्रता से विद्रोह करके ऐसे आत्मविनाशी बीज मंत्रों का समय है, जो हमारी युगों पुरानी वैज्ञानिक प्रगति को औंधा करके रख देगा। विश्वास नहीं होता कि हम उस भूखंड पर खड़े हैं, जहां आर्यभट्‌ट जैसे वैज्ञानिक, दयानंद जैसे पांखड विरोधी और कबीर जैसे विवेकवादी और निर्भीक संत हुए, जो सब दकियानूसी मान्यताओं से अलग राय रखने और झूठ को झूठ आैर असत्य को असत्य कहने का साहस रखते थे और ऐसा करते हुए अपने प्राणाें तक से प्रेम नहीं करते थे। यह अमर्त्य सेन जैसे विवेकवादी अर्थशास्त्रियों और मदर टेरेसा जैसी मानवताकामी मनीषा वाले हृदयों का देश भी है।

ऋतुराज वंसत आगमन 💐💐💐💐

खेतां करूं हळोतियो
बीजूं मूंग ग्वार
भीगो मरूधर आज म्हारो
मुळ्क रह्या नर नार

धोरा धरती उखल गिया
मोतीयों री आस में
बाजर बोयो खेत में
सिटो चढ्यो आकाश में

पाणी तरसते थार में
इन्द्रदेव मेहर करी
चांदी जेड़ी इण धरती ने
कर दीनी है हरी हरी

ढोर चरे अड़ाव में
मिनख खपे खेत में
सगळा ने निहाल किया
निवण करूं इण रेत ने

काचर मतीरा होवसी
तिल आळे तेड़े में
टाबर टींगर जीमसी
बैठा बैठा खेड़े में

किण विद मैं बखाण करूं
आखर म्हारा कम पड़े
शीश नवाऊं ईं धरती नें
जिणसूं धान पेट पडे़ !!

ऋतुराज वंसत के आगमन पर संम्पुर्ण पृथ्वीलोक वासियों की मंगलकामनाएँ !

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

Narcissist ( आत्मकामी ) का चरित्र-चित्रण


Narcissist ( आत्मकामी ) का चरित्र-चित्रण
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वक़्त, बेवक़्त, हर वक़्त, यहां भी, वहां भी, कहीं भी, जहां भी हो वहीं पर उछल-उछल कर खुद ही ख़ुद की तारीफ़ की डुगडुगी जोर-शोर से बजाते रहना, ख़ुद को करिश्माई शख्सियत घोषित करना, आत्मस्तुति का राग अलापते रहना, बेशर्मी की हद तक खुद की विरुदावलियां गाते रहना, देश-काल की नज़ाकत की अनदेखी कर खुद के बारे में गढ़ी हुई कहानियाँ कहते रहना, स्व-केंद्रित प्रवृत्ति का पुरज़ोर पोषण करना---ये कुछ ख़ास खूबियाँ होती हैं, आत्ममोह ( Narcissism ) का शिकार बन चुके शख्स की। मनोवैज्ञानिक ऐसे मनोरोगी को नारसिस्ट / आत्मकामी की संज्ञा देते हैं। मनोविकार से ग्रसित ऐसा शख्स खुद की प्रशंसा करने, अपने मुंह मिंया मिठ्ठू बनने, अपने मन की बात लोगों को ज़बरदस्ती सुनाने और दूसरों को धकियाकर खुद को प्रमोट करने का मौका तलाशते रहता है। वह यह नहीं जानता कि ऐसा करके वह उपहास का पात्र बनता जा रहा है।

मंगलवार, 10 जुलाई 2018

इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है...!

इस धरती की हर मां कम्युनिस्ट होती है...!

त्रिभुवन
बहुत साल पहले की बात है। उन दिनों में स्कूली छात्र था और कम्युनिस्ट शब्द पहली बार कानों में पड़ा था। यह शब्द प्रयुक्त किया था एक सरदार साहेब ने, जिन्हें मैं नानाजी कहा करता था।

वे दिखने में साधु जैसे थे, लेकिन थे सरदार। घर में कारें-जीपें बहुत थीं, लेकिन मेरे बाबा से मिलने के लिए वे घोड़े पर आते थे। दोनों की दोस्ती की वजह घोड़े, उपनिषद चर्चा और सिख-इस्लाम या दार्शनिक विषय हुआ करते थे। वे उपनिषदों की बहुत सी कहानियां बड़े ही रोचक ढंग से सुनाया करते थे।

आरएसएस व देशभक्ति!संभव ही नही.....

आरएसएस व देशभक्ति!संभव ही नही

✍✍✍आपने घोड़े की झाप के बारे में सुना ही होगा!शादी में जो घोड़ा लाया जाता है उसके दोनों कानों को ढक दिया जाता है व दांए-बांए नहीं देख पाता।सिर्फ आगे की तरफ 60°एंगल में ही देख पाता है।आरएसएस से जुड़े जितने भी लोग होते है उनको त्रिवर्षीय कोर्स के प्रथम ईयर में ही यह झाप पहना दिया जाता है। Thought of bunch सरीखी आदर्शवादी किताबों के जरिये बंच ऑफ़ बुद्धू में तब्दील कर दिया जाता है।बस उसी एंगल से हर बात/मुद्दे को परिभाषित करना होता है।दुनियाँ की हर चीज को अलग-अलग एंगल से देखा जाएगा तो हटकर विचार पैदा हो सकते है जो संघी व्यवस्था अर्थात मनुवादी व्यवस्था के लिए खतरा पैदा कर देती है इसलिए दुनियाँ से एक्सपोज़र की सारी लाइने यह झाप पहनाकर काट दी जाती है।

✍✍✍आरएसएस अर्थात संघी व्यवस्था कभी भी अपने विचारधारा से किसी व्यक्ति को महान नहीं बनने देती।मनुवादी व्यवस्था व्यक्ति की उपयोगिता देखती है।उपयोगिता खत्म और काम तमाम!इसलिए किसी संघी को किसी और से कोई खतरा नहीं होता है।इस देश मे दो तरह के वर्ग है एक मेहनत के बल पर पूँजी पैदा करने वाला और दूसरा पूँजी से पूँजी पैदा करने वाला।आरएसएस अर्थात मनुवादी पूँजी से पूँजी पैदा करने वाले वर्ग के हित मे व्यवस्था बनाये रखने का काम करता है इसलिए संघ कभी किसान आत्महत्या,बेरोजगारी, भुखमरी,अशिक्षा,चिकित्सा ,गरीबी के लिए कोई आंदोलन नहीं करता है।

✍✍✍आरएसएस अर्थात संघी विरोधियों से निपटने के लिए चार तरीकों से काम करता है।पहला नजरअंदाज करना जैसे आप उनके विचारों/नीतियों का विरोध करते हो तो चुपचाप आपको नजरअंदाज कर दिया जाएगा।दूसरा विरोध करना यानी आरएसएस आपके बीच से ही पैदा किये अपने झाप पहनाए गुलामों से ही आपका विरोध करवायेगा ताकि आप आपस मे उलझकर ही अपना समय व ऊर्जा बर्बाद करते रहो।तीसरा हत्या यानि आरएसएस को लगने लगता है कि यह अब उनकी व्यवस्था के लिए खतरा बनता जा रहा है तो जो दिमाग मे नफरतों का जहर भरकर कट्टर उन्मादी तैयार किये है उनको अप्रत्यक्ष तौर पर उकसाता है कि देखो हमारे धर्म को गालियां दे रहा है!देश के विरोध में काम कर रहा है!जातिवाद फैलाकर  देश को तोड़ रहा है!फिर कलबुर्गी/गौरी लंकेश जैसे परिणाम सामने आते है!चौथा तरीका है खुद अपना लो अर्थात जब लगे कि किसी के साथ बड़ा जनमत जुड़ा हुआ है और उनसे सीधी टक्कर लेना संभव नहीं तो उसको खुद अपनाकर उनके विचारों में विकृतियां पैदा करके हत्या कर दी जाती है।गौतम बुद्ध विष्णु के अवतार,सरदार पटेल के साथ कांग्रेस ने अन्याय किया,महाराजा सूरजमल महान थे सरीखे परिणाम आपको देखने को मिलते है।

✍✍✍आरएसएस यानी संघी मनुवादियों का झुंड है।संघी मतलब सर्वश्रेष्ठ!यह एक श्रेष्ठी वर्ग है जो मानवता,नैतिकता,संविधान किसी को नहीं मानता है।यही कारण था कि अंडमान की सेलुलर जेल में महाराष्ट्र के 550कैदी थे सब वहीं मर गए लेकिन एक माफिवीर सावरकर बाहर आया था!महारानी विक्टोरिया को सलामी देते थे!देश की आजादी से इनका कोई लेना देना नहीं था।ये लोग अपनी व्यवस्था बनाये रखने की जद्दोजहद में फंसे हुए थे।इनकी व्यवस्था को खतरा आजादी के बाद शुरू होने वाला था इसलिए ये लोग अपनी ऊर्जा भविष्य के लिए बचा रहे थे।यही कारण रहा कि एक भी संघी देश की आजादी के लिए शहीद नहीं हुआ था।

✍✍✍आरएसएस यानी संघियों को खतरा मुसलमानों व ईसाइयों से था।कमेरा वर्ग तो इनका सदियों से गुलाम रहा था और आगे भी गुलाम बनाये रखने को लेकर अपनी काबिलियत पर पूरा भरोसा था।जब अंग्रेजों के समय सबको मतदान व प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया जाने लगा तो तथाकथित लोकमान्य तिलक का गुस्सा फूट पड़ा और कहा "ये तेली-तम्बोली संसद में क्या करेंगे?"यही कारण रहा कि देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था तब संघी मुसलमानों व ईसाइयों के खिलाफ नफरत की जहरीली फसल की बुवाई कर रहे थे इसी का परिणाम था कि आजादी के समय ये लोग संविधान व तिरंगे का विरोध कर रहे थे!ये लोग खुद को संविधान से ऊपर मानते है इसलिए आज तक आरएसएस का रेजिस्ट्रेशन नहीं करवाया है क्योंकि संघ मनुस्मृति को सर्वोपरि मानता है व उसी व्यवस्था का पोषक है।

✍✍✍आरएसएस का विरोधियों को खत्म करने का चौथा नुस्खा अभी धड़ाधड़ चल रहा है कि अपनाकर/कब्जा करके मिलावट करके विकृत कर दो ताकि मनुवादी व्यवस्था के लिए लंबे समय तक कोई खतरा पैदा न हो!संविधान को 60°एंगल से परिभाषित किया जा रहा है!शिक्षण संस्थानों सहित हर लोकतांत्रिक व्यवस्था को झाप वाले 60°एंगल से सेट किया जा रहा है।सरकारी तंत्र में धीरे-धीरे 60°एंगल वाले इतने सेट कर दिए है कि न इनको शाखा लगाने के लिए किसी की अनुमति लेने की जरूरत पड़ती है न निक्कर पहनकर हाथों में लाठियां,तलवारे सहित हथियार लेकर पथ संचलन करने के लिए किसी की अनुमति लेने की जरूरत पड़ती है।झाप पहने पुलिस वाले कहते है कि हिन्दू संगठन ही तो कर रहा है!झाप पहने शिक्षक कहते है हमारा ही तो संगठन है स्कूल मैदान में करे तो क्या दिक्कत है!मोहल्ले वाले कहते है देशभक्त लोग है पार्क में दूब थोड़ी-बहुत खराब हो भी जाएगी तो क्या हो जाएगा!

मतलब संघी/मनुवादी व्यवस्था खुद को बनाये रखने के लिए संविधान,लोकतंत्र, मानवता,नैतिकता,मानवाधिकार आदि ठेंगे पर रखकर हर वो काम कर रही है जिससे एक सभ्य समाज,एक राष्ट्र कमजोर होता जाएं लेकिन विरोध उस अंदाज में नहीं होते जिस अंदाज में होना चाहिए क्योंकि झाप वाली 60°वालों की संख्या ज्यादा जुटा ली है व स्वतंत्र सोच,दुनियाँ से एक्सपोज़र रखने वाले लोग खामोश है।चाहे संविधान की हत्या कर दें लेकिन लोगों का बचना जरूरी है क्योंकि भगतसिंह आज भी दस्तावेजों में एक आतंकी ही तो है!

देशभक्ति के प्रमाणपत्र बांटने वालों का वीडियो देखिए।तिरंगे की होली जलाने वाले लोगों का तिरंगे के प्रति दिलों में सम्मान कभी नहीं हो सकता!

भाजपा के झंडे को राष्ट्रगान के साथ सलामी!
बस चले तो ये लोग करदे देश की ही नीलामी!!

प्रेमाराम सियाग

रविवार, 17 जून 2018

एक लड़का था। बहुत brilliant था। सारी जिंदगी फर्स्ट आया। साइंस में हमेशा 100% स्कोर किया। ऐसे बच्चे आमतौर पर इंजिनियर बनने चले जाते हैं, सो उसका भी सिलेक्शन हो गया IIT चेन्नई  में। वहाँ से B Tech किया और आगे पढने अमेरिका चला गया। वहाँ आगे की पढ़ाई पूरी की। M.Tech बगैरह कुछ किया होगा फिर उसने यूनिवर्सिटी ऑफ़ केलिफ़ोर्निआ से MBA किया।
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अब इतना पढने के बाद तो वहाँ अच्छी नौकरी मिल ही जाती है। सुनते हैं कि वहाँ भी हमेशा टॉप ही किया, और  वहीं अमेरिका में नौकरी करने लगा। बताया जाता है कि 05 बेडरूम का घर था उसके पास।
शादी भी वहीं, चेन्नई की ही एक बेहद खूबसूरत लड़की से हो गई। बताते हैं कि ससुर साहब भी कोई बड़े आदमी ही थे, कई किलो सोना दिया उन्होंने अपनी लड़की को दहेज़ में।
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अब हमारे यहाँ आजकल के हिन्दुस्तान में इससे आदर्श जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। एक मनुष्य को और क्या चाहिए अपने जीवन में? पढ़ लिख के इंजिनियर बन गए, अमेरिका में सेटल हो गए, मोटी तनख्वाह की नौकरी, बीवी-बच्चे, सुख ही सुख, इसके बाद हीरो-हेरोइन के मानिंद सुखपूर्वक वहाँ की साफ़-सुथरी सड़कों पर भ्रष्टाचार मुक्त माहौल में सुखपूर्वक विचरने लगे...

.दूसरा परिदृश्य:
अब एक दोस्त हैं हमारे, भाई नीरज जाट जी। एक नंबर के घुमक्कड़ हैं, घर कम रहते हैं, सफ़र में ज्यादा रहते हैं।  ऐसी-ऐसी जगह घूमने चल पड़ते हैं पैदल ही कि बता नहीं सकते, 04-06 दिन पहाड़ों पर घूमना, trekking करना आदि उनके लिए आम बात है। एक से बढ़कर एक दुर्गम स्थानों पर जाते हैं, और फिर आके किस्से सुनाते हैं, ब्लॉग लिखते हैं। उनका ब्लॉग पढ़ के मुझे थकावट हो जाती है, न रहने का ठिकाना न खाने का ठिकाना (मानों जिंदगी ही सफ़र में हो), फिर भी कोई टेंशन नहीं। चल पड़ते हैं घूमने, बैग कंधे पर लाद के। मेरी बीवी अक्सर मुझसे कहती है कि एक तो तुम पहले ही आवारा थे ऊपर से ऐसे दोस्त पाल लिए, नीरज जाट जैसे! जो न खुद घर रहते हैं और न दूसरों को रहने देते हैं!! बहला-फुसला के ले जाते हैं अपने साथ!!!
पर मुझे उनकी घुमक्कड़ी देख सुनके रश्क होता है, कितना रफ एंड टफ है यार ये आदमी! कितना जीवट है! बड़ी सख्त जान है!
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आइए अब जरा कहानी के पहले पात्र पर दुबारा आ जाते हैं। तो आप उस इंजिनियर लड़के का क्या फ्यूचर देखते हैं लाइफ में?
क्यों, सब बढ़िया ही दीखता है? पर नहीं, आज से तीन साल पहले उसने वहीं अमेरिका में, सपरिवार आत्महत्या कर ली! अपनी पत्नी और बच्चों को गोली मारकर खुद को भी गोली मार ली! What went wrong? आखिर ऐसा क्या हुआ, गड़बड़ कहाँ हुई???
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ये कदम उठाने से पहले उसने बाकायदा अपनी wife से discuss किया, फिर एक लम्बा suicide नोट लिखा और उसमें बाकायदा justify किया अपने इस कदम को और यहाँ तक लिखा कि यही सबसे श्रेष्ठ रास्ता था इन परिस्थितयों में! उनके इस केस को और उस suicide नोट को California Institute of Clinical Psychology ने study किया है! What went wrong?
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हुआ यूँ था कि अमेरिका की आर्थिक मंदी के दौर में उसकी नौकरी चली गई! बहुत दिन खाली बैठे रहे! नौकरियाँ ढूँढते रहे! फिर अपनी तनख्वाह कम करते गए और फिर भी जब नौकरी न मिली... मकान की किश्त भी टूट गयी... तो सड़क पे आने की नौबत आ गई! बताते हैं, कुछ दिन किसी पेट्रोल पम्प पे तेल भरा! साल भर ये सब बर्दाश्त किया और फिर अंत में ख़ुदकुशी कर ली...
ख़ुशी-ख़ुशी!  उसकी बीवी भी इसके लिए राज़ी हो गई, ख़ुशी ख़ुशी!! जी हाँ लिखा है उन्होंने- हम सब लोग बहुत खुश हैं, कि अब सब-कुछ ठीक हो जाएगा, सब कष्ट ख़त्म हो जाएँगे!!!
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*इस case study को ऐसे conclude किया है experts ने :*

 This man was programmed for success but he was not trained, how to handle failure.
यह व्यक्ति सफलता के लिए तो तैयार था, पर इसे जीवन में ये नहीं सिखाया गया कि असफलता का सामना कैसे किया जाए!
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आइए ज़रा उसके जीवन पर शुरु से नज़र डालते हैं! बहुत तेज़ था पढने में, हमेशा फर्स्ट ही आया! ऐसे बहुत से Parents को मैं जानता हूँ जो यही चाहते हैं कि बस उनका बच्चा हमेशा फर्स्ट ही आए, कोई गलती न हो उस से! गलती करना तो यूँ- मानो कोई बहुत बड़ा पाप कर दिया!!! और हमेशा फर्स्ट आने के लिए वो "सब-कुछ" करने को तत्पर रहते हैं,
फिर ऐसे बच्चे चूँकि पढ़ाकू कुछ ज्यादा होते हैं सो खेलकूद, घूमना फिरना, लड़ाई-झगडा, मार-पीट, ऐसे पंगों का मौका कम मिलता है इन बेचारों को!
12 th करके निकले तो इंजीनियरिंग कॉलेज का बोझ लद गया बेचारों पर, वहाँ से निकले तो MBA और अभी पढ़ ही रहे थे की मोटी तनख्वाह की नौकरी! अब तनख्वाह मोटी तो जिम्मेवारी भी उतनी ही विशाल! यानि बड़े-बड़े targets...
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कमबख्त ये दुनिया, बड़ी कठोर है और ये जिंदगी, अलग से इम्तहान लेती है! आपकी कॉलेज की डिग्री और मार्कशीट से कोई मतलब नहीं उसे! वहाँ कितने नंबर लिए कोई फर्क नहीं पड़ता! ये जिंदगी अपना अलग question paper सेट करती है! और सवाल साले,सब out ऑफ़ syllabus होते हैं, टेढ़े मेढ़े, ऊट-पटाँग और रोज़ इम्तहान लेती है, कोई date sheet नहीं!
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एक बार एक बहुत बड़े स्कूल में हम लोग summer camp ले रहे थे दिल्ली में। Mercedeze और BMW में आते थे बच्चे वहाँ। तभी एक लड़की, रही होगी यही कोई 7-8 साल की, अचानक जोर-जोर से रोने लगी! हम लोग दौड़े, क्या हुआ भैया, देखा तो वो लड़की हल्का सा गिर गई थी। वहाँ ज़मीन कुछ गीली थी सो उसके हाथ में ज़रा सी गीली मिटटी लग गई थी और थोड़ी उसकी frock में भी!! बस!!! सो वो जार-जार रोए जा रही थी! खैर हमने उसके हाथ धोए और ये बताया कि कुछ नहीं हुआ बेटा, ये देखो, धुल गयी मिटटी  खैर साहब, थोड़ी देर में high heels पहने उसकी माँ आ गई... और उसने हमारी बड़ी क्लास लगाई कि आप लोग ठीक से काम नहीं करते हो, लापरवाही करते हो, कैसे गिर गया बच्चा, अगर कुछ हो जाता तो? इतना बड़ा हादसा, भगवान न करे किसी और के साथ हो जीवन में...!!!
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एक और आँखों देखी घटना बताता हूँ कि कैसे माँ-बाप स्वयं अपने बच्चों को spoil करते हैं!
हम लोग एक स्कूल में एक और कैंप लगा रहे थे, बच्चे स्कूल बस से आते थे। ड्राईवर ने जोर से ब्रेक मारी तो एक बच्चा गिर गया और उसके माथे पे हल्की सी चोट लग गई, यही कोई एक सेन्टीमीटर का हल्का सा कट! अब वो बच्चा जोर-जोर से रोने लगा, बस यूँ समझ लीजे, चिंघाड़-चिंघाड़ के, क्योंकि उसने वो खून देख लिया अपने हाथ पे! खैर मामूली सी बात थी, हमने उसे फर्स्ट ऐड दे के बैठा दिया! तभी, यही कोई 10 मिनट बीते होंगे, उस बच्चे के माँ बाप पहुँच गए स्कूल... और फिर वहाँ जो रोआ-राट मची... वो बच्चा जितनी जोर से रोता, उसकी माँ उससे भी ज्यादा जोर से चिंघाड़ती और एक तरफ़ उसका बाप जोर-जोर से चिल्ला रहा था, पागलों की तरह! मेरे बच्चे को सर में चोट लगी है, आप लोग अभी तक हॉस्पिटल ले के नहीं गए? अरे ये तो न्यूरो का केस है सर में चोट लगी है!!!
मेरा एक दोस्त जो वहाँ PTI था उसके साथ हम उसे एक स्थानीय neurology के हॉस्पिटल में ले गए। अब अस्पताल वालों को तो बकरा चाहिए काटने के लिए! वहाँ पर भी उस लड़के का बाप CT Scan, Plastic surgery न जाने क्या-क्या बक रहा था! पर finally उस अस्पताल के doctors ने एक BANDAID लगा के भेज दिया।
              एक और किस्सा उसी स्कूल का, एक श्रीमान जी सुबह-सुबह आ के लड़ रहे थे, क्या हुआ भैया, स्कूल बस नहीं आई, हमें आना पड़ा छोड़ने! बाद में पता चला श्रीमानजी का घर स्कूल से बमुश्किल 200 मीटर दूर, उसी कालोनी में तीन सड़क छोड़ के था और लड़का उनका 10 साल का था!!

क्या बनाना चाहते हैं आजकल के माँ-बाप अपने बच्चों को? ये spoon fed बच्चे जीवन के संघर्षों को कैसे या कितना झेल पाएँगे?

अगले परिदृश्य पर गौर फरमाएँ-
                आज से लगभग 15 साल पहले, मेरा बड़ा बेटा 4-5 साल का था, अपने खेत पे जा रहे थे हम। बरसात का season था, धान के खेतों में पानी भरा था। मेरे बेटे ने मुझसे कहा, पापा, मुझे गोदी उठा लो. मैंने कहा कुछ नहीं होता बेटा, पैदल चलो और वो चलने लगा और थोड़ी ही देर बाद पानी में गिर गया! कपडे सब कीचड में सन गए! अब वो रोने लगा, मैंने फिर कहा कुछ नहीं हुआ बेटा, उठो, वो वहीं बैठा-बैठा रो रहा था! उसने मेरी तरफ हाथ बढाए, मैंने कहा अरे पहले उठो तो और वो उठ खड़ा हुआ! मैंने उसे सिर्फ अपनी ऊँगली थमाई और वो उसे पकड़ के ऊपर आ गया। हम फिर चल पड़े। थोड़ी देर बाद वो फिर गिर गया, पर अबकी बार उसकी प्रतिक्रिया बिलकुल अलग थी। उसने सिर्फ इतना ही कहा, अर्रे... और हम सब हँस दिए, वो भी हँसने लगा... फिर अपने आप उठा और ऊपर आ गया। मुझे याद है उस साल हम दोनों बाप-बेटे बीसों बार उस खेत पे गए होंगे, वो उसके बाद वहाँ से आते-जाते कभी नहीं गिरा!

                कल मैं मेरे वह मित्र, नीरज जाट जी की करेरी झील की trekking वाली पोस्ट पढ़ रहा था। 04 दिन उस सुनसान बियाबान में रहे, जिसमें रास्ता तक का पता नहीं चलता, और वो भी  इतनी बारिश और ओला वृष्टि में, ऊपर से लेकर नीचे तक भीगे हुए, भूखे/प्यासे, न रहने का आसरा न सोने का ठिकाना!!! उस कीचड भरे मंदिर के कमरे में, उस बिना chain वाले स्लीपिंग बैग में, रात बिता के भी, कितने खुश थे वो। इतना संघर्षशील आदमी भला क्या जीवन में कभी हार मानेगा?

             कार्तिक राजाराम! जीहाँ, यही नाम था उस लड़के का। काश उसे भी बचपन में गिरने की, गिर-गिर के उठने की, बार-बार हारने की, और हार के बार-बार जीतने की ट्रेनिंग मिली होती!!!

          कठोपनिषद में एक मंत्र है, उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। उठो जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक आगे बढ़ते रहो। शुरू से ही अपने बच्चों को इतना कोमल, इतना सुकुमार मत बनाइए कि वो इस ज़ालिम दुनिया के झटके बर्दाश्त ही ना कर सके!!

             एक अंग्रेजी उपन्यास में एक किस्सा पढ़ा था- एक मेमना अपनी माँ से दूर निकल गया। आगे जाकर पहले तो भैंसों के झुण्ड से घिर गया, उनके पैरों तले कुचले जाने से बचा किसी तरह! अभी थोड़ा ही आगे बढ़ा था कि एक सियार उसकी तरफ झपटा! किसी तरह झाड़ियों में घुस के जान बचाई तो सामने से भेड़िए आते दिखे!! वह बहुत देर तक वहीं झाड़ियों में दुबका रहा, फिर किसी तरह माँ के पास वापस पहुँचा तो बोला, माँ, वहाँ तो बहुत खतरनाक जंगल है!!!
Mom, there is a jungle out there.

*"इस खतरनाक जंगल में जिंदा बचे रहने की ट्रेनिंग अभी से अपने बच्चों को दीजिए।"*

गुरुवार, 24 मई 2018

सिक्खों की शहादत की कीमत कौन जाने!


सिक्खों की शहादत की कीमत कौन जाने!
औरंगजेब के शासन काल मे कश्मीर का नवाब जैनुअल आब्दीन था।कश्मीर में कश्मीरी पंडितों व मुसलमानों के बीच दंगे होने लग गए थे तो जैनुअल आब्दीन ने सख्ती का प्रयोग किया।बल प्रयोग से त्रस्त एक हजार कश्मीरी पंडित कृपादत के नेतृत्व में सिक्खों के नौवें गुरु तेग बहादुर से तिलक-जनेऊ के लिए मदद मांगने आये थे।गुरु तेग बहादुर जुल्म के खिलाफ लड़ने के लिए तैयार हो गए और हजारों सिक्खों की सेना के साथ कूच किया।साथ मे भाई मतिदास,भाई सतीदास व भाई दयाला भी थे।