मंगलवार, 31 जुलाई 2018

सामाजिक चेतना के चितेरे मुंशी प्रेमचंद

सामाजिक चेतना के चितेरे मुंशी प्रेमचंद
********************************
असली नाम : धनपत राय
जन्म : 31 जुलाई 1880
जन्म- स्थल : वाराणसी के पास स्थित लमही गाँव
मृत्यु : 8 अक्टूबर 1936
लेखन की भाषा : उर्दू व हिंदी
रचनाओं का केंद्र: आम आदमी की संघर्षपूर्ण जिंदगी
रचनाओं का मुख्य कथ्य: ग्रामीण जीवन की विसंगतियां, विषमता, सामाजिक विद्रूपता, उत्पीड़न
शुरूआती लेखन
धनपत राय ने शुरुआत में उर्दू में 'नवाब राय' के नाम से लेखन किया। उनका पहला लघु उपन्यास 'असरार ए म आबिद' (हिंदी में – देवस्थान रहस्य) था, जिसमें उन्होंने मंदिरों में पुजारियों द्वारा धर्म की आड़ में की जा रही लूट-पाट और महिलाओं के साथ किये जा रहे शारीरिक शोषण को उज़ागर किया। उनका पहला कहानी संग्रह 'सोज़े-वतन' (अर्थात ' देश का दर्द' ) शीर्षक से 1908 में प्रकाशित हुआ। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत होने के कारण इस पर अंग्रेज़ी हुकूमत ने रोक लगा दी और इसके लेखक को भविष्‍य में इस तरह का लेखन न करने की चेतावनी दी। 'सोजे-वतन' की सभी प्रतियाँ जब्त कर जला दी गईं।

सोमवार, 30 जुलाई 2018

एक माँ का पुत्र के नाम भावुक पत्र

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के संदर्भ में एक माँ द्वारा 10 वीं कक्षा में अध्ययनरत अपने बेटे के नाम लिखा एक मार्मिक खत, जिसे प्रत्येक अभिभावक/अध्यापक को पढ़कर चिंतन करने की आवश्यकता है:-
-------------------------------------------------------------------

*मैं जुआ हार गई*
-बंशी सहारण

*एक माँ का खत बेटे के नाम*

*बंशी हनुमानगढ़ जिले के चाईया ग्राम की रहने वाली है।* *वर्तमान में पुलिस कान्स्टेबल पद पर किशनगढ़, जिला अजमेर में कार्यरत है।* *बंशी ने अपने बेटे जीतेश के नाम बड़ा ही मार्मिक खत लिखा है।* *हर अभिभावक को यह खत जरूर पढ़ना चाहिए।* *यह खत हमारी आंखें खोल देने और हमें अंधकार से उजाले की तरफ ले जाने में सक्षम है।*

*उनकी अनुमति से यहां शेयर कर रहा हूं।* *पसंद आए तो आप भी शेयर कर दीजिए।*

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

जाटों और दलितों के के उच्च पदों पर काबिज होने से क्यों बौखलाता है मीडिया

जाटों और दलितों के  के उच्च पदों पर काबिज होने से क्यों बौखलाता है मीडिया.......                                                                                                                                                                                                            26 जुलाई कोराजस्थान सरकार ने चुनावों के मद्देनजर  आईपीएस ऑफिसर्स की ट्रांसफर सूची जारी की इसमें कुल 34 मेंसे 13  जाट ,7 -8  ब्राह्मण,7 -8   जैन और अन्य जातियों के अफसर भी हैं फिर भी जाट और दलित से मीडिया इतना क्यों जलता है आइए इसी तबादला सूची पर फ्रस्ट इण्डिया न्यूज़ की बौखलाहट देखते हैं इस चैनल ने यह लिखा                                                                                                                             

आईपीएस तबादला सूची का पोस्टमार्टम !

 जयपुर: आईपीएस तबादला सूची का पोस्टमार्टम !, गृह विभाग ने पुलिस में की जबरदस्त 'सोशल इंजीनियरिंग', जाट समुदाय के अफसरों की हुई बल्ले-बल्ले, 14 जिलों में लगे जाट एसपी, विधानसभा चुनाव के मौके पर बढ़ी जाट अफसरों की हिस्सेदारी, जयपुर ग्रामीण-अलवर-दौसा-डीसीपी नॉर्थ-धौलपुर-सवाईमाधोपुर, कोटा-ग्रामीण-बारां-बीकानेर और चित्तौड़ जैसे जिलों में लगे जाट एसपी, दूसरी ओर राजपूत समुदाय से केवल दो अफसर बने एसपी, करौली और भरतपुर जिलों में लगे राजपूत एसपी, वैसे चुनाव के मौके पर ये नहीं है कोई नई बात,http://firstindianews.com/news/BTN-RJ-BREAKING-5108-27JULY-KS-CONTROL-SM-MUST-BIG-FULL-SCREEN-358431860  यह लिंक आप खुद देख लीजिए जरा                                                                                                                                                   सोचिए मीडिया की जाटों और दलितों के प्रति यह जलन अथवा बौखलाहट कब से  है  इस बौखलाहट की शुरुआत आज नहीं हुई है यह सदियों पुरानी बौखलाहट है जाटों और दलितों  में बढ़ती जागरूकता और ब्राह्मणबाद के उखड़ती जड़ों से यह मीडिया बेहद चिंतित है अब आइए आपको दिखाते  हैं देश पर असल में कव्जा किसका है, आरक्षण को खैरात कहने वालों का खैरात के घरों यानि मदिरों और मठों पर एकाधिकार है फिर भी यह मीडिया इस एकाधिकार की बात नहीं करता क्योंकि इन्हे डर शता रहा है यह मीडिया के जरिए भोले भाले obc  और sc -st को गुमराह करके  सच को छिपा लेते हैं और झूठ परोसते रहते हैं अब यह लिस्ट देखिए कब्ज़ा किसका है...                                                                                                                                 जिस तरह कहीं आतंकवाद पलता है ठीक उसी तरह भारत में ब्राह्मणवाद पल रहा है "आइऐ देखते हैं....                                                           जिस तरह कहीं आतंकवाद पलता है ठीक उसी तरह भारत में ब्राह्मणवाद पल रहा है "आइऐ देखते हैं 
SC"ST"OBC के लोगो के अधिकारो रोजी-रोटी नोकरियो के उपर ब्राह्मणो का कहर " 
No 1' राष्ट्रपति सचिवालय मे कुल पद 49' है जिसमे '45 ब्राह्मण "SC'ST 4" OBC 00 
" No2 उप राष्ट्रपति सचिवालय मे कुल पद 7' जिसमे 7 ही ब्राह्मण "SC00''ST00" BC 00 
"No3 मंत्रियो के कैबिनेट सचिव कुल पद 20 ' जिसमे 19 ब्राह्मण "SC'ST 1 "OBC 00 " 
No4 प्रधानमंत्री कार्यालय मे कुल पद 35 जिसमे 33 ब्राह्मण "SC'ST 2 "OBC 00 
" No 5 कृषि एवं सिचंन विभाग मे कुल पद 274 " जिसमे 259 ब्राह्मण "SC'ST 15" OBC 00" 
No 6 रक्षा मंत्रालय मे कुल पद है 1379 जिसमे 1331 ब्राह्मण" SC'ST 48 "OBC 00 है " 
No 7 समाज कल्याण एवं हैल्थ मंत्रालय कुल पद 209 जिनमे 192 ब्राह्मण "SC'ST 17 "OBC 00 है 
No 8 वित्त मंत्रालय मे कुल पद है 1008 " जिसमे 942 ब्राह्मण "SC'ST 66 " OBC 00 है 
No 9 ग्रह मंत्रालय मे कुल पद है 409 जिसमें 377 ब्राह्मण " SC'ST 19" OBC 13 है 
No 10 श्रम मंत्रालय मे कुल पद है 74 जिसमे 70 ब्राह्मण "SC'ST 4" OBC 00 है 
No 11 रसायन एवं पेट्रोलियम मंत्रालय मे कुल पद है 121 जिसमे 112 ब्राह्मण " SC'ST 9" OBC 00 है 
No 12 राज्यपाल एवं उपराज्यपाल कुल पद है 27 जिसमे 25 ब्राह्मण SC'ST 00" OBC 2 
No 13 विदेश मे राजदूत 140 जिसमे 140 ही ब्राह्मण है "SC'ST 00 " OBC 00 है 
No 14 विश्वविद्यालय के कुलपति पद 108 जिसमे 108 ही ब्राह्मण है " SC'ST 00" OBC 00 है 
No 15 प्रधान सचिव के पद है 26 जिसमे 26 ही ब्राह्मण है " SC'ST 00" OBC 00 है 
No 16 हाइकोर्ट के न्यायाधीश है 330 जिसमे 326 ब्राह्मण " SC'ST 4" OBC 00 है 
No 17 सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश 23 जिसमे 23 ही ब्राह्मण " SC'ST 00" OBC 00 है 
No 18 IAS अधिकारी 3600 जिसमे 2950 ब्राह्मण " SC'ST 600 " OBC 50 है 
No 19 "PTI कुल पद 2700 जिसमे 2600 ब्राह्मण " SC'ST 00" OBC 00 है 
"No 20 शंकराचार्य कुल 05 जिसमे 05 ही ब्राह्मण है" SC'ST 00 OBC 00 है ।                                          dainik jan uday khabar                                                                                                         यह उत्तरप्रदेश की पूरी खबर नेशनल जनमत की पूरी पड़ताल यहां सम्पूर्ण सिस्टम पर ब्राह्मणवाद का कब्जा है आप इस लिंक से पूरी खबर पढ़ सकते हैं..... 

जातिवाद: UP के नौकरशाहों की ट्रांसफर-पोस्टिंग की जिम्मेदारी सिर्फ ब्राह्मण ऑफीसर्स के हवाले !                                                                                      जातिवाद: UP के नौकरशाहों की ट्रांसफर-पोस्टिंग की जिम्मेदारी सिर्फ ब्राह्मण ऑफीसर्स के हवाले !                                                                                                      अब आइए अब जाट दलित बनाम मीडिया  और जाट गैर जाट की साजिश को समझने की कोशिश करते हैं यह जाट बनाम मीडिया  और जाट बनाम गैर जाट के विषय पर लिखा गया है लेकिन यह ब्राह्मणवादी मीडिया जाटों और दलितों से समान रूप से एक जैसा व्यवहार करता है  हाँ यह जाटों और दलितों को आपस में लड़ाने  का कोई मौका नहीं छोड़ता है आपको यह लेख पढ़ने के बाद समझ आ जाएगा कि जाटों और दलितों के साथ जो हो रहा  के क्या कारण  है तो ले पढ़िए। ...                                                                                                                                                                                                                                     जाट बनाम मीडिया


मीडिया प्रचार का सशक्त माध्यम रहा है चाहे कोई भी समय या काल हो समय के साथ-साथ इसका स्वरूप भी बदल रहा है । प्राचीन में चारण, भाट और जोगी आदि मीडिया के तीन सशक्त स्तम्भ थे । इसके अतिरिक्त स्थानीय जागे होते थे जो अपनी पोथियों में अपनी शैली अनुसार विभिन्न जातियों व गौत्रों की वंशावलियां दर्ज करते थे । भाटों की पोथियों का तो अभी तक उल्लेख किया जाता है । इनका लिखने और दर्ज करने का तरीका अपनी मर्जी और मनमानी हुआ करता था और ये लोग उसी की प्रशंसा किया करते थे जो इन्हें बदले में भेंट देता था । इसी कारण यह कहावत प्रचलित हुई कि जिसकी खावै बाकली उसके गावै गीत अर्थात् जैसा जो इन्हें देता था उसके लिए वैसा ही ये लिखते थे और गाते थे । 

जब सातवीं सदी के अंत में माऊंट आबू पर्वत पर ‘बृहत् यज्ञ’ में अग्निकुण्ड से राजपूत जाति की उत्पत्ति की घोषणा की तो ब्राह्मणवाद ने इसे क्षत्रिय जाति स्थापित करने के लिए इसका धुआंधार प्रचार किया और इसकी जिम्मेवारी ब्राह्मणी मीडिया ने ली । इसी को इस मीडिया ने अपनी लेखनी का साधन बनाया जिसे चारण और भाटों ने घूम-घूमकर गाया । जबकि यही मीडिया पहले प्रचार करता रहा कि परशुराम ने क्षत्रियों का सर्वनाश कर दिया था और इसी गुणगान के साथ ब्राह्मणवादी लोग राजपूत राजाओं के पुरोहित बन गए जबकि इस जाति का उल्लेख किसी भी प्राचीन ग्रंथ में नहीं है । इन लोगों ने राजपूत राजाओं के पुरोहित होकर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए इन्हें आपस में इतना लड़ाया कि वे कभी भी मुगलों के विरोध

में कोई भी बड़ी लड़ाई नहीं जीत पाए और न ही अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ पाए लेकिन फिर भी इन्होंने हल्दी घाटी जैसी छोटी लड़ाई को भी, जिसमें केवल महाराणा प्रताप के 59 सैनिक मारे गए थे तथा यह लड़ाई केवल ढाई घण्टे चली थी, जो भी हो इन्होंने राजपूत जाति की वीरता का धुआंधार प्रचार किया क्योंकि राजपूत राजा इन्हें एक दूसरे से बढ़कर दान दक्षिणा दिया करते थे जबकि जाटों में इस प्रकार के इतिहास लिखवाने की कोई भावना नहीं थी । इसी का उदाहरण है कि महाराजा सूरजमल तथा महाराजा रणजीत सिंह ने मुगलों को पीट-पीटकर अपनी रियासतों की स्थापना की जो अधिकतर राजपूत रियासतों से बड़ी रियासतें थी और इन्होंने अपने जीवन में कभी कोई लड़ाई नहीं हारी । इसी कारण इन महान राजाओं का नाम भारतीय इतिहास से गायब है । इसका मुख्य कारण जाटों का स्वभाव था कि वे खिला-पिलाकर इतिहास लिखवाने में विश्वास नहीं रखता था क्योंकि उनका विश्वास था कि वे इतिहास बनाते हैं, लिखवाते नहीं जब आधुनिक युग आया तो राजपूतों की अधिकतर रियासतें कमजोर पड़ चुकी थी या समाप्त हो चुकी थी जिस कारण ये पुरोहितवाद और ब्राह्मणवाद ढीला पड़ने लगे तो इन्होंने इस युग में समाचार पत्र-पत्रिकाओं का सहारा लिया जो मीडिया के स्तम्भ बने । जो जातियां पहले से ही शिक्षित थी जैसे कि कायस्थ, अरोड़ा खत्री आदि उनको भी इन्होंने अपने साथ लगा लिया और समय आते-आते यह इनका पेशा बन गया । जब एक पेशा हो गया तो आपस में भाईचारा भी होना था । इस प्रकार इन जातियों ने इस मीडिया पर अपना पूर्ण प्रभुत्व कर लिया सन् 1980 के बाद टी.वी. मीडिया अर्थात् इलैक्ट्रोनिक भी जुड़ गया जो समाचार पत्र पत्रिकाओं से भी अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुआ । इसके स्वामी भी लगभग उसी वर्ग से हैं जो समाचार पत्र-पत्रिकाओं से हैं । इनकी आय का सबसे बड़ा साधन सरकारी विज्ञापन और निजी कम्पनियों के विज्ञापन हैं । वर्तमान में समाचार पत्रों अर्थात् मीडिया का पूर्णतया व्यवसायीकरण हो चुका है । ये लोग वही माल परोसते हैं जिसमें इनको पैसा मिलता है।

जैसा रवैया ब्राह्मणवाद ने जाटों के विरोध में अपनाया था वही विरोध समाचार पत्र पत्रिकाओं में भी जारी रहा और उसी परम्परा को इलैक्ट्रोनिक मीडिया ने भी आगे बढ़ाया है और इसका उदाहरण हमने अभी हरियाणा के जाट आंदोलन में देखा है जब इन ब्राह्मणी मीडिया ने जाटों के विरुद्ध इतना झूठा प्रचार किया की जाटों को विलेन बना दिया                                                                                                                                                              जाट बनाम नॉन जाट

जाट बनाम नॉन जाट , किसान कौम के लिए एक षड़यंत्र है। ये फार्मूला मंडी-फंडी लॉबी द्वारा देश में सत्ता पर कब्ज़ा करने के लिए चलाया जा रहा है। ये हिन्दू vs मुस्लिम की तरह है। एक वर्ग को खलनायक बनाकर ध्रुवीकरण करना। जहाँ मुस्लिम नहीं है वहां जाट vs नॉन जाट का इस्तेमाल किया जा रहा है।  वैसे जहाँ मंडी-फंडी लम्बे समय से सत्ता से बहार है, उन राज्यों में इस फार्मूले का इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे महाराष्ट्र में मराठा vs नॉन मराठा, झारखण्ड में आदिवासी vs नॉन आदिवासी , बिहार में कुर्मी यादव vs अन्य, हरियाणा में जाट vs नॉन जाट। इस फार्मूले का फायदा भी मंडी फंडी लॉबी को होता है।  अब राजस्थान में जहाँ राजनीती/सत्ता में जाटों का प्रभाव बढ़ रहा है वहा भी जाट vs नॉन जाट लॉबी सक्रिय हो गयी है। पंजाब में भी इसकी 

शुरआत हो चुकी है।

मीडिया भी इस नॉन जाट मिशन का हिस्सा है। जब भी कोई जमीन विवाद , आपसी विवाद या धर्म आधारित कोई लड़ाई झगड़ा हो उसमे मीडिया जाट vs नॉन जाट बना , पुरे देश में जाटों  की छवि खलनायक/शोषक/अत्याचारी की तरह बना देती है। इस से नॉन जाट ध्रुवीकरण हो जाता है , जिसका  नुकसान जाटो  को उठाना पड़  रहा है, हरियाणा इसका उदहारण है।

आप सभी  बारे में अपनी राय दे ताकि इस नॉन जाट ध्रुवीकरण को रोक जा सके। मंडी फंडी को छोड़ सभी किसान मजदूर जातियों को इस ध्रुवीकरण से भरी नुकसान हो रहा है।  

कुछ जाट भी इस नॉन जाट ध्रुवीकरण को बढ़ा रहे है क्योंकि उनको ये नहीं पता कि ये हमारे खिलाफ शाजिश है, और हमें इसका मुक़ाबला करना है। हमें  जाट सहयोगी जातियों को समझाना पड़ेगा, और " फॉर जाट/ प्रॉ जाट/ फार्मर" गठबंधन बनाना पड़ेगा। इसकी शुरुआत जाट को एक मिशन की तरह करनी पड़ेगी।

आँसुओं से भीगी दावत.....मृत्युभोज

मृत्युभोज एक सामाजिक कलंक है.....
दिल-ओ-दिमाग से बहिष्कृत हो मृत्युभोज नामक कुरीति,इस आंसुओं से भीगी दावत का बहिष्कार किया जाना चाहिए क्योंकि, दोस्तों एक तरफ तो हम इंसान चांद, मंगल और प्लूटो पर पहुंचकर अपनी असीम मानसिक क्षमता का परिचय दे रहें हैं,तो दूसरी तरफ़ ऐसा भोज..! हाल ही में चीन देश में एक समय मानव (जिसके हाथों से दिव्य प्रकाशिक किरणें निकल रहीं थी) ने सड़क पर जा रहे रिक्शा चालक की भयंकर सड़क दुर्घटना होने से पहले ही एक सेकण्ड से भी कम समय में रक्षा की। मतलब उस चालक को प्रकाश की गति से भी तीव्र गति से अचानक प्रकट होकर रिक्शे सहित सड़क के दूसरी तरफ रख दिया। यही नहीं, मशहूर हास्य अभिनेता चार्ली चैपलिन की पहली फिल्म के प्रमोशन के वीडियो को ध्यान से देखा गया तो, उस वीडियो में एक महिला फोन पर बात करते हुऐ दिख रही है,जबकि उस समय मोबाईल फोन का आविष्कार नहीं हुआ था तो सोचो यह विचित्र मानव कौन है। दोस्तों यह समय यात्री है।

दहेज प्रथा एक अभिशाप !


दहेज प्रथा एक अभिशाप !

यूँ तो मानव समाज एवं सभ्यता के समक्ष कई सारी चुनौतियाँ मुँह बाए खड़ी हैं, परंतु इनमें से एक चुनौती ऐसी है, जिसका कोई भी तोड़ अभी तक समर्थ होता नहीं दिख रहा है। कहना नहीं होगा कि विवाह संस्कार से जुड़ी हुई यह सामाजिक विकृति दहेज प्रथा ही है । दहेज कुप्रथा भारतीय समाज के लिए एक भयंकर अभिशाप की तरह है । हमारी सभ्यता एवं संस्कृति का यह एक बड़ा कलंक है। ‘ दहेज ‘ शब्द अरबी भाषा के ‘ जहेज ‘ शब्द से रूपान्तरित होकर उर्दू और हिन्दी में आया है जिसका अर्थ होता है ‘ सौगात ‘। इस भेंट या सौगात की परम्परा भारत में कब से प्रचलित हुई, यह विकासवाद की खोज के साथ जुड़ा हुआ तथ्य है। विवाह के अवसर पर कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को दी जाने वाली धन, सम्पत्ति और सामान इत्यादि को ‘दहेज’ कहा जाता है। वर पक्ष विवाह तय करने से पूर्व ही कन्या पक्ष से दहेज में दी जाने वाली राशि एवं सामान के विषय में मांग करता है और मिलने का आश्वासन प्राप्त होने पर ही विवाह पक्का होता है। इस प्रकार लड़कियों को सुखी रखने की भावना से लड़के वालों को खुश करने के लिये लड़की के माता पिता द्वारा दहेज दिया जाता है।
दहेज लेने और देने की प्रथा कोई नयी नहीं है। प्राचीन काल से ही इस प्रथा का चलन है। हमारे यहाँ भारत में कन्यादान को एक पवित्र धार्मिक कार्य माना जाता है। प्राचीन काल में आर्शीवाद स्वरूप माता पिता अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी बेटी को वस्त्र, गहने एवं उसकी नयी घर गृहस्थी का कुछ सामान भेंट करते थे। इसका मूल उदे्दश्य यही था कि वर वधु नयी नयी गृहस्थी सुचारू रूप से चला सकें। लड़की का मान सम्मान सुसराल में उसके द्वारा किये जाने वाले व्यवहार एवं संस्कारों पर निर्भर था, लड़की द्वारा लाये गये दहेज पर नहीं। वर्तमान युग में दहेज प्रथा एक सामाजिक प्रथा के रूप में अ​भिशाप बन गयी है। यह दिन प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है और पूरे समाज को इसकी काली विशैली जीभ लीलती जा रही है।
दहेज का अर्थ है जो सम्पत्ति, विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ़ से वर को दी जाती है। दहेज को उर्दू में जहेज़ कहते हैं। यूरोप, भारत, अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है। भारत में इसे दहेज, हुँडा या वर-दक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नक़द या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है। प्राचीन समय से ही भारतीय समाज में कई प्रकार की प्रथाएं विद्यमान रही हैं जिनमें से अधिकांश परंपराओं का सूत्रपात किसी अच्छे उद्देश्य से किया गया था। इसे शुरू करने के पीछे बहुत अछा मकसद था यह परम्परा सिर्फ हिंदू परम्परा नहीं थी। यह परम्परा बहुत सारे संस्कृतियों में होता था। पहले हमारे समाज में बेटियों को हर जरूरत की चीजें और कुछ पैसे देते थे जिससे वह आर्थिक रूप से कमजोर न रहे व अपने ससुराल में कुछ तकलीफ न हो। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ इन प्रथाओं की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिंह लगता गया जिसके परिणामस्वरूप पारिवारिक और सामाजिक तौर पर ऐसी अनेक मान्यताएं आज अपना औचित्य पूरी तरह गंवा चुकी हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ परंपराएं ऐसी भी हैं जो बदलते समय के साथ-साथ अधिक विकराल ग्रहण करती जा रही हैं। दहेज प्रथा ऐसी ही एक कुरीति बनकर उभरी है जिसने ना जाने कितने ही परिवारों को अपनी चपेट में ले लिया है। इन प्रथाओं का सीधा संबंध पुरुषों को महिलाओं से श्रेष्ठ साबित कर, स्त्रियों को किसी ना किसी रूप में पुरुषों के अधीन रखना था। सती प्रथा हो या फिर बहु विवाह का प्रचलन, परंपराओं का नाम देकर महिलाओं के हितों की आहुति देना कोई बुरी बात नहीं मानी जाती थी। भले ही वर्तमान समय में ऐसी अमानवीय प्रथाएं अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, लेकिन इन्हीं कुप्रथाओं में से एक दहेज प्रथा आज भी विवाह संबंधी रीति-रिवाजों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। समय बदलने के साथ-साथ इस प्रथा के स्वरूप में थोड़ी भिन्नता अवश्य आई है लेकिन इसे समाप्त किया जाना दिनों-दिन मुश्किल होता जा रहा है।
हमारा समाज पुरुष प्रधान है। हर कदम पर केवल पुरुषों को बढ़ावा दिया जाता है। बचपन से ही लड़कियों के मन में ये बातें डाली जाती हैं कि बेटे ही सबकुछ होते हैं और बेटियां तो पराया धन होती हैं। उन्हें दूसरे के पर जाना होता है, इसलिए माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बेटा होता है ना कि बेटियां समाज में सबकी नहीं पर यादातर लोगों के सोच यही होती है कि लड़कियों की पढ़ाई में खर्चा करना बेकार है। उन्हें पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना बेकार है, आखिरकार उन्हें दूसरों के घर जाना है पर यदि बेटा कुछ बनेगा कमाएगा तो माता-पिता का सहारा बनेगा। यही नहीं लड़कों पर खर्च किए हुए पैसे उनकी शादी के बाद दहेज में वापस मिल जाता है। यही कारण है माता-पिता बेटों को कुछ बनाने के लिए कर्ज तक लेने को तैयार हो जाते हैं। पर लड़कियों की हालात हमेशा दयनीय रहती है, उनकी शिक्षा से यादा घर के कामों को महत्व दिया जाता है। इस मानसिकता को हमे परिवर्तित करना होगा। ज्‍यादातर माता-पिता लड़कियों की शिक्षा के विरोध में रहते हैं। वे यही मानते हैं कि लड़कियां पढ़कर क्या करेगी। उन्हें तो घर ही संभालना है। परंतु माता-पिता समझना चाहिए कि  पढऩा-लिखना कितना जरूरी है वो परिवार का केंद्र विंदु होती है। उसके आधार पर पूरे परिवार की नींव होती है। उसकी हर भूमिका चाहे वो बेटी का हो, बहन का हो, पत्नी का हो बहू का हो या फिर सास पुरुषों की जीवन को वही सही मायने में अर्थ देती है।
दहेज प्रथा के अंतर्गत युवती का पिता उसे ससुराल विदा करते समय तोहफे और कुछ धन देता है। इस धन और तोहफों को स्त्रीधन के नाम से भी जाना जाता है। अब यही धन वैवाहिक संबंध तय करने का माध्यम बन गया है। प्राचीन समय में पुरुष अपनी पसंद की स्त्री का हाथ मांगते समय उसके पिता को कुछ तोहफे उपहार में देता था, ससुराल पक्ष इसमें ना तो कोई मांग रखता था और ना ही दहेज को अपनी संपत्ति कह सकता था। लेकिन अब समय पूरी तरह बदल चुका हैं, और वर पक्ष के लोग मुंहमांगे धन की आशा करने लगे हैं जिसके ना मिलने पर स्त्री का शोषण होना, उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाना कोई बड़ी बात नहीं है। प्राचीन काल में शुरू हुई यह परंपरा आज अपने पूरे विकसित और घृणित रूप में हमारे सामने खड़ी है। यही कारण है कि हर विवाह योग्य युवती के पिता को यही डर सताता रहता है कि अगर उसने दहेज देने योग्य धन संचय नहीं किया तो उसके बेटी के विवाह में परेशानियां तो आएंगी ही, साथ ही ससुराल में भी उसे आदर नहीं मिल पाएगा। दहेज प्रथा के वीभत्स प्रमाण हैं, प्रताड़ना की घटनाएँ, जो अंतत: नवविवाहित वधुओं की ‘दहेज हत्या’ के रूप में परिणता होती हैं। लड़कियों के साथ बुरे बर्ताव, भेदभाव तथा कन्या भ्रूण और कन्या शिशुओं की हत्या जैसे जघन्य कृत्यों के रूप में सामने आने वाले इसके दुष्परिणाम दहेज प्रथा की उस क्रूरता को प्रदर्शित करते हैं, जिसका सामना हमारा समाज आज भी कर रहा है। माता-पिता रिश्‍ता करते समय रूपयों के लालच में करते है वह यह नहीं देखते कि लड़का-लड़की में क्‍या अवगुण है यह नहीं देखते है !
समाज में दहेज प्रथा एक ऐसा सामाजिक अभिशाप बन गया है जो महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों, चाहे वे शा‍रीरिक हों या फिर मानसिक, को बढावा देता है। वर्तमान समय में दहेज व्यवस्था एक ऐसी प्रथा का रूप ग्रहण कर चुकी है जिसके अंतर्गत युवती के माता-पिता और परिवारवालों का सम्मान दहेज में दिए गए धन-दौलत पर ही निर्भर करता है। वर-पक्ष भी सरेआम अपने बेटे का सौदा करता है। प्राचीन परंपराओं के नाम पर युवती के परिवार वालों पर दबाव डाल उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। इस व्यवस्था ने समाज के सभी वर्गों को अपनी चपेट में ले लिया है। संपन्न परिवारों को शायद दहेज देने या लेने में कोई बुराई नजर नहीं आती। क्योंकि उन्हें यह मात्र एक निवेश लगता है। उनका मानना है कि धन और उपहारों के साथ बेटी को विदा करेंगे तो यह उनके मान-सम्मान को बढ़ाने के साथ-साथ बेटी को भी खुशहाल जीवन देगा। लेकिन निर्धन अभिभावकों के लिए बेटी का विवाह करना बहुत भारी पड़ जाता है। वह जानते हैं कि अगर दहेज का प्रबंध नहीं किया गया तो विवाह के पश्चात बेटी का ससुराल में जीना तक दूभर बन जाएगा। परन्‍तु अक्‍सर ऐसा देखने में आया है कि दहेज लेने के पश्‍चात ससुराल पक्ष की मांग ओर बढती जाती है और बेटी का बाप उसकी मांगों को पुरी नहीं कर पाता है तो वे उसे यातना देने लगते है।
हमारा सामाजिक परिवेश कुछ इस प्रकार बन चुका है कि यहां व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके आर्थिक हालातों पर ही निर्भर करती है। जिसके पास जितना धन होता है उसे समाज में उतना ही महत्व और सम्मान दिया जाता है। ऐसे परिदृश्य में लोगों का लालची होना और दहेज की आशा रखना एक स्वाभाविक परिणाम है। आए दिन हमें दहेज हत्याओं या फिर घरेलू हिंसा से जुड़े समाचारों से दो-चार होना पड़ता है। यह मनुष्य के लालच और उसकी आर्थिक आकांक्षाओं से ही जुड़ी है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिसे जितना ज्यादा दहेज मिलता है उसे समाज में उतने ही सम्माननीय नजरों से देखा जाता है।
दहेज के खिलाफ हमारे समाज में कई कानून बने लेकिन इसका कोई विशेष फायदा होता नजर नहीं आता है। जगह-जगह अक्सर यह पढ़ने को तो मिल जाता है ”दहेज लेना या देना अपराध है” परंतु यह पंक्ति केवल विज्ञापनों तक ही सीमित है, आज भी हमारे चरित्र में नहीं उतरी है। दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए अब तक कितने ही नियमों और कानूनों को लागू किया गया हैं, जिनमें से कोई भी कारगर सिद्ध नहीं हो पाया। 1961 में सबसे पहले दहेज निरोधक कानून अस्तित्व में आया जिसके अनुसार दहेज देना और लेना दोनों ही गैरकानूनी घोषित किए गए। इसके बाद सन् 1985 में दहेज निषेध नियमों को तैयार किया गया था। इन नियमों के अनुसार शादी के समय दिए गए उपहारों की एक हस्ताक्षरित सूची बनाकर रखा जाना चाहिए। इस सूची में प्रत्येक उपहार, उसका अनुमानित मूल्य, जिसने भी यह उपहार दिया है उसका नाम और संबंधित व्यक्ति से उसके रिश्ते का एक संक्षिप्त विवरण मौजूद होना चाहिए। नियम बना तो दिए जाते हैं लेकिन ऐसे नियमों को शायद ही कभी लागू किया जाता है। 1997 की एक रिपोर्ट में अनुमानित तौर पर यह कहा गया कि प्रत्येक वर्ष 5,000 महिलाएं दहेज हत्या का शिकार होती हैं। उन्हें जिंदा जला दिया जाता है जिन्हें दुल्हन की आहुति के नाम से जाना जाता है। इन सब कानूनों के होने के बावजूद भी व्यावहारिक रूप से बेटीयों को इसका कोई लाभ नहीं मिल पाया। इसके विपरीत इसकी लोकप्रियता और चलन दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। अभिभावक बेटी के पैदा होने पर खुशी जाहिर नहीं कर पाते, क्योंकि कहीं ना कहीं उन्हें यही डर सताता रहता है कि बेटी के विवाह में खर्च होने वाले धन का प्रबंध कहां से होगा। इसके विपरीत परिवार में जब बेटा जन्म लेता है तो वंश बढ़ने के साथ धन आगमन के विषय में भी माता-पिता आश्वस्त हो जाते हैं। यही वजह है कि पिता के घर में भी लड़कियों को महत्व नहीं दिया जाता। बोझ मानकर उनके साथ हमेशा हीन व्यवहार ही किया जाता है। वहीं विवाह के पश्चात दहेज लोभी ससुराल वाले विवाह में मिले दहेज से संतुष्ट नहीं होते बल्कि विवाह के बाद वधू को साधन बनाकर उसके पिता से धन और उपहारों की मांग रखते रहते हैं, जिनके पूरे ना होने पर युवती के साथ दुर्व्यवहार, मारपीट होना एक आम बात बन गया है। आज भी बिना किसी हिचक के वर-पक्ष दहेज की मांग करता है और ना मिल पाने पर नववधू को उनके कोप का शिकार होना पड़ता है।
इंसान शिक्षा प्राप्त करने के बाद अच्छे और बुरे में फर्क करना सीख जाता है। शिक्षा बुराईयों को खत्म करने का सबसे कारगर हथियार है। परंतु यही शिक्षा दहेज जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने में असफल साबित हुई है। दूसरे शब्दों में शिक्षित वर्ग में ही यह गंदगी सबसे यादा पाई जाती है। आज हमारे समाज में जितने शिक्षित और सम्पन्न परिवार है, वह उतना अधिक दहेज पाने की लालसा रखता है। इसके पीछे उनका यह मनोरथ होता है कि जितना यादा उनके लड़के को दहेज मिलेगा समाज में उनके मान-सम्मान, इजत, प्रतिष्ठा में उतनी ही चांद लग जाएगी। एक डॉक्टर, इंजीनियर लड़के के घरवाले दहेज के रूप में 15-20 लाख की मांग करते है, ऐसे में एक मजबूर बेटी का बाप क्या करे? बेटी के सुखी जीवन और उसके सुनहरे भविष्य की खातिर वे अपनी उम्र भर की मेहनत की कमाई एक ऐसे इंसान के हाथ में सौंपने के लिए मजबूर हो जाते हैं जो शायद उनके बेटी से यादा उनकी पैसों से शादी कर रहे होते है। इच्छा तो हर ईंसान के मन में पनपती है, चाहे वह अमीर हो या गरीब। ज्‍यादातर शिक्षित और संपन्न परिवार ही दहेज लेना अपनी परंपरा का एक हिस्सा मानते हैं तो ऐसे में अल्पशिक्षित या अशिक्षित लोगों की बात करना बेमानी है। युवा पीढ़ी, जिसे समाज का भविष्य समझा जाता है, उन्हें इस प्रथा को समाप्त करने के लिए आगे आना होगा ताकि भविष्य में प्रत्येक स्त्री को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले और कोई भी वधू दहेज हत्या की शिकार ना होने पाए। दहेज प्रथा भारतीय समाज पर एक बहुत बड़ा कलंक है जिसके परिणामस्वरूप ना जाने कितने ही परिवार बर्बाद हो चुके हैं, कितनी महिलाओं ने अपने प्राण गंवा दिए और कितनी ही अपने पति और ससुराल वालों की ज्यादती का शिकार हुई हैं। सरकार ने दहेज प्रथा को रोकने और घरेलू हिंसा को समाप्त करने के लिए कई योजनाएं और कानून लागू किए हैं। लेकिन फिर भी दहेज प्रथा को समाप्त कर पाना एक बेहद मुश्किल कार्य है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यह है कि भले ही ऊपरी तौर पर इस कुप्रथा का कोई भी पक्षधर ना हो लेकिन अवसर मिलने पर लोग दहेज लेने से नहीं चूकते। अभिभावक भी अपनी बेटी को दहेज देना बड़े गौरव की बात समझते हैं, उनकी यह मानसिकता मिटा पाना लगभग असंभव है।
वास्तव में दहेज प्रथा की वर्तमान विकृती का मुख्य कारण नारी के प्रति हमारा पारंपरिक दष्टिकोण भी है। एक समय था जब बेटे और बेटी में कोई अंतर नहीं माना जाता था। परिवार में कन्या के आवगमन को देवी लक्ष्मी के शुभ पदार्पण का प्रतीक माना जाता था। धीरे-धीरे समाज में नारी के अस्तित्व के संबंध में हमारे समाज की मानसिकता बदलने लगी। कुविचार की काली छाया दिन-ब-दिन भारी और गहरी पड़ती चली गई। परिणामस्वरूप घर की लक्ष्मी तिरस्कार की वस्तु समझी जाने लगी। नौबत यहां तक आ गई कि हम गर्भ में ही उसकी हत्या करने लगे। अगर हम गौर करें तो पायेंगे कि भ्रूण हत्या भी कहीं न कहीं दहेज का ही कुपरिणाम है। दहेज प्रथा की यह विकृति समाज के सभी वर्गों में समान रूप से घर कर चुकी है। उच्चवर्ग तथा कुछ हद तक निम्नवर्ग इसके परिणामों का वैसा भोगी नहीं है जैसा कि मध्यमवर्ग हो रहा है। इसके कारण पारिवारिक और सामाजिक जीवन में महिलाओं की स्थिती अत्यंत शोचनीय बनती जा रही है। आए दिन ससुराल वालों की ओर से दहेज के कारण जुल्म सहना और अंत में जलाकर उसका मार दिया जाना किसी भी सभ्य समाज के लिए बड़ी शर्मनाक बात है।
नारी शक्ति का रूप मानी जाती है। लड़की और लड़कों में इतना फर्क क्यों किया जाता है। इतनी असमानता क्यों मानी जाती है। इसका जवाब केवल यह है कि लड़के कुल का दीपक होते हैं और लड़कियां पराया धन। लड़के की शादी में ढेर सारे पैसे मिलते हैं, लड़कियों की शादी में ढेर सारे रुपये खर्च करना पड़ता है। ये जानते हुए कि दहेज लेना और देना दोनों अपराध है। फिर लोग ये गुनाह करते हुए नहीं हिचकते। जबकि लड़कियों ने हमेशा हर कदम पर खुद को साबित किया है। यदि उन्हें अछी शिक्षा दी जाए तो वे लड़कों से भी यादा बेहतर काम करेंगी। भारत की कई महिलाओं ने भारत का सर गर्व से ऊंचा किया है। ऐसे कई उदाहरण हैं जैसे राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, बहिन मायावती, सोनिया गांधी, लता मंगेशकर, मदर टेरिसा, कल्‍पना चावला, सानिया मर्जा, सायना नेहवाल, किरण बेदी आदि बहुत सारी महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में देश-विदेश में भारत को अलग पहचान दिलाई।
दहेज प्रथा कैसे रोकें ?
दहेज एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसका परित्याग करना बेहद जरूरी है। दहेज प्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिए समाज सुधारकों द्वारा किए गए महत्वपूर्ण और प्रभावपूर्ण प्रयत्नों के बावजूद इसने अत्यंत भयावह रूप धारण कर लिया है। इसका विकृत रूप मानव समाज को भीतर से खोखला कर रहा है। वर्तमान हालातों के मद्देनजर यह केवल अभिभावकों और जन सामान्य पर निर्भर करता है कि वे दहेज प्रथा के दुष्प्रभावों को समझें। क्योंकि अगर एक के लिए यह अपनी प्रतिष्ठा की बात है तो दूसरे के लिए अपनी इज्जत बचाने की। इसे समाप्त करना पारिवारिक मसला नहीं बल्कि सामूहिक दायित्व बन चुका है। इसके लिए जरूरी है कि आवश्यक और प्रभावी बदलावों के साथ कदम उठाए जाएं और दहेज लेना और देना पूर्णत: प्रतिबंधित कर दिया जाए। अभिभावकों को चाहिए कि वे अपनी बेटियों को इस काबिल बनाएं कि वे शिक्षित बन स्वयं अपने हक के लिए आवाज बुलंद करना सीखें। अपने अधिकारों के विषय में जानें उनकी उपयोगिता समझें। क्योंकि जब तक आप ही अपनी बेटी का महत्व नहीं समझेंगे तब तक किसी और को उनकी अहमियत समझाना नामुमकिन है। आवश्यकता है एक ऐसे स्वस्थ सामाजिक वातावरण के निर्माण की जहां नारी अपने आप को बेबस और लाचार नहीं बल्कि गौरव महसूस करे। जहां उसे नारी होने पर अफसोस नहीं गर्व हो। उसे इस बात का एहसास हो कि वह बोझ नहीं सभ्यता निर्माण की प्रमुख कड़ी है। वास्तव में दहेज जैसी लानत को जड़ से खत्म करने के लिए युवाओं को एक सशक्त भूमिका निभाने की जरूरत है। उन्हें समाज को यह संदेश देने की आवष्यकता है कि वह दहेज की लालसा नहीं रखते हैं अपितु वह ऐसा जीवनसाथी चाहते हैं जो पत्नी, प्रेयसी और एक मित्र के रूप में हर कदम पर उसका साथ दे। चाहे वह समाज के किसी भी वर्ग से संबंध रखती हो। दहेज प्रथा के पीछे भी ज्‍यादातर महिलाएं ही होते हैं उन्हें खुद भी दहेज लेना बहुत पसंद है। उन्हें एक महिला की भावना को समझना चाहिए और इस प्रकार की प्रथा का तिरस्कार करना चाहिए। मेरा यह मानना है कि अगर दहेज प्रथा समाज से पूरी तरह समाप्‍त हो जाए तो कन्‍या भ्रूण हत्‍या स्‍वत: ही समाज से समाप्‍त हो जायेगी। आमिर खान के कार्यक्रम “सत्यमेव जयते” का तीसरा एपिसोड दहेज पर था। दहेज की वजह से हमारे देश में हो रही मौतें इस बार के एपिसोड का मुद्दा है। इस प्रकार के कार्यक्रम के माध्‍यम से समाज में जागरूकता पैदा की जा सकती है अत: इस तरह के कार्यक्रमों को नेशनल टी.वी. पर बढावा देना चाहिए और समय समय पर इनका प्रसारण अपनी नैतिक जिम्‍मेदारी को समझते हुए टी.वी. चेनलों को करना चाहिए। क्‍योंकि आज के युवा वर्ग को जेसा हम दिखाएंगे सिखाएंगे और पढ़ाएंगे वो ही जाकर हमारा भविष्‍य बनेंगे। आओ हम सब मिलकर दहेज प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाए ओर प्रतिज्ञा ले कि –
“ना दहेज ले और ना हि दहेज दें।”

नशा एक ऐसी बुराई है

नशा एक अभिशाप !

नशा एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान का अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है। नशे के लिए समाज में शराब, गाॅजा, भाॅग, अफीम, जर्दा, गुटखा, तम्बाकू और धूम्रपान बीडी, सिगरेट, हुक्का, चिलम सहित सरस, स्मैक, कोकीन, ब्राउन शुगर, जैसे घातक मादक दवाओं और पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है। इस जहरीले और नशीले पदार्थों के सेवन से व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि पहुॅचने के साथ ही इससे सामाजिक वातावरण भी प्रदूषित होता है। साथ ही स्वयं और परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति को भी बहुत नुकसान पहुॅचाता है। नशा के आदी व्यक्ति को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। नशे करने वाला व्यक्ति परिवार के लिए बोझ स्वरूप हो जाता है। उसकी समाज के लिए उपादेयता शून्य हो जाती है। वह नशे से अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है तथा शान्ति पूर्ण समाज के लिये अभिशाप बन जाता है। नशा एक अन्तर्राष्ट्रीय विकराल समस्या बन गयी है। इस दुव्र्यसन से आज स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग और विशेष कर युवा वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है। जो इसके चंगुल में फंस गया वह स्वयं तो बर्बाद होता ही है, इसके साथ ही उसका परिवार भी बर्बाद हो जाता है। आज कल देखा जा रहा है कि युवा वर्ग इसकी चपेट में दिनों दिन आ रहा है, वह तरह-तरह के नशे जैसे तम्बाकू, गुटखा, बीडी, सिगरेट और शराब के चंगुल में फंसता ही जा रहा है जिसके कारण उसका कैरियर चौपट हो रहा है।
नशा एक अभिशाप है। यह एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान का अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है। नशे के लिए समाज में शराब, गांजा, भांग, अफीम, जर्दा, गुटखा, तम्‍बाकु और धूम्रपान (बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, चिलम) सहित चरस, स्मैक, कोकिन, ब्राउन शुगर जैसे घातक मादक दवाओं और पदार्थों का उपयोग किया जा रहा है। इन जहरीले और नशीले पदार्थों के सेवन से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक हानि पहुंचने के साथ ही इससे सामाजिक वातावरण भी प्रदूषित होता ही है साथ ही स्‍वयं और परिवार की सामाजिक स्थिति को भी भारी नुकसान पहुंचाता है। नशे के आदी व्यक्ति को समाज में हेय की दृष्टि से देखा जाता है। नशे करने वाला व्‍यक्ति परिवार के लिए बोझ स्वरुप हो जाता है, उसकी समाज एवं राष्ट्र के लिया उपादेयता शून्य हो जाती है। वह नशे से अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है तथा शांतिपूर्ण समाज के लिए अभिशाप बन जाता है। नशा अब एक अन्तराष्ट्रीय विकराल समस्या बन गयी है। दुर्व्यसन से आज स्कूल जाने वाले छोटे-छोटे बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग और विशेषकर युवा वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे है। इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पा लेने में ही मानव समाज की भलाई है। जो इसके चंगुल में फंस गया वह स्वयं तो बर्बाद होता ही है इसके साथ ही साथ उसका परिवार भी बर्बाद हो जाता है। आज कल अक्सर ये देखा जा रहा है कि युवा वर्ग इसकी चपेट में दिनों-दिन आ रहा है वह तरह-तरह के नशे जैसे- तम्बाकू, गुटखा, बीडी, सिगरेट और शराब के चंगुल में फंसती जा रही है। जिसके कारण उनका कैरियर चौपट हो रहा है। दुर्भाग्य है कि आजकल नौजवान शराब और धूम्रपान को फैशन और शौक के चक्कर में अपना लेते हैं। इन सभी मादक प्रदार्थों के सेवन का प्रचलन किसी भी स्थिति में किसी भी सभ्य समाज के लिए वर्जनीय होना चाहिए।
जैसा कि हम सभी जानते हैं धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी होती है और यह चेतावनी सभी तम्बाकू उत्पादों पर अनिवार्य रूप से लिखी होती है, और लगभग सभी को यह पता भी है। परन्तु लोग फिर भी इसका सेवन बड़े ही चाव से करते हैं। यह मनुष्य की दुर्बलता ही है कि वह उसके सेवन का आरंभ धीरे-धीरे करता है पर कुछ ही दिनों में इसका आदी हो जाता है, एक बार आदी हो जाने के बाद हम उसका सेवन करें, न करें; तलब ही सब कुछ कराती है।
समाज में पनप रहे विभिन्न प्रकार के अपराधों का एक कारण नशा भी है। नशे की प्रवृत्ति में वृध्दि के साथ-साथ अपराधियों की संख्या में भी वृध्दि हो रही है। नशा किसी भी प्रकार का हो उससे शरीर को भारी नुकसान होता है, पर आजकल के नवयुवक शराब और धूम्रपान को फैशन और शौक के लिए उपयोग में ला रहे हैं। यहां तक की दूसरे व्यक्तियों द्वारा ध्रूमपान करने से भी सामने वाले व्यक्ति के फेफड़ों में कैंसर और अन्य रोग हो सकते हैं। इसलिए न खुद धूम्रपान करें और न ही किसी को करने दें। कोकीन, चरस, अफीम ऐसे उत्तेजना लाने वाले पदार्थ है जिसके प्रभाव में व्यक्ति अपराध कर बैठता है। इनके सेवन से व्यक्ति पागल तथा सुप्तावस्था में हो जाता है। इसी तरह तंबाखू के सेवन से तपेदिक, निमोनिया और सांस की बीमारियों सहित मुख फेफडे और गुर्दे में कैंसर होने की संभावनाएं रहती हैं। इससे चक्रीय हृदय रोग और उच्च रक्तचाप की शिकायत भी रहती है।
डॉक्टरों का कहना है कि शराब के सेवन से पेट और लीवर खराब होते हैं। इससे मुख में छाले पड़ सकते हैं और पेट का कैंसर हो सकता है। पेट की सतही नलियों और रेशों पर इसका असर होता है, यह पेट की अंतड़ियों को नुकसान पहुंचाती है। इससे अल्सर भी होता है, जिससे गले और पेट को जोड़ने वाली नली में सूजन आ जाती है और बाद में कैंसर भी हो सकता है। इसी तरह गांजा और भांग जैसे पदार्थ इंसान के दिमाग पर बुरा असर डालते हैं। इन सभी मादक द्रव्यों से मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचने के साथ-साथ समाज, परिवार और देश को भी गंभीर हानि सहन करनी पड़ती है। किसी भी देश का विकास उसके नागरिकों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है, लेकिन नशे की बुराई के कारण यदि मानव स्वास्थ्य खराब होगा तो देश का भी विकास नहीं हो सकता। नशा एक ऐसी बुरी आदत है जो व्यक्ति को तन-मन-धन से खोखला कर देता है। इससे व्यक्ति के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जाती है। इस बुराई को समाप्त करने के लिए शासन के साथ ही समाज के हर तबके को आगे आना होगा। यह चिंतनीय है कि जबसे बाजार में गुटका पाउच का प्रचलन हुआ है, तबसे नशे की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। आज बच्चे से लेकर बुजुर्ग भी गुटका पाउच के चपेट में है।
-: जरा इस ओर ध्‍यान देवें :-
:- शराब पीने वाले व्यक्ति का 50/- रु. रोज का खर्च मानकर चलें, तो एक महीने का 1,500/- रु. व सालभर में 18,000/- रु. होते हैं। एक व्यक्ति अपने जीवन भर में 50 वर्ष शराब का सेवन करता है तो 9,00,000/- रु. (नौ लाख) फिजूल खर्च कर देता है।
:- सिर्फ एक साल की बचत 18000/- रु. पोस्ट ऑफिस में फिक्स (किसान विकास-पत्र) जमा कराने से 42 वर्ष, 11 महीने तक रिन्यू कराते रहने पर यह रकम 5,76,000/- रु जमा हो जाती है। जो आपकी जिन्दगी के लिए पेन्शन या बच्चों की शिक्षा के काम आ सकती है।
:- बीड़ी पीने वाले व्यक्ति का बीड़ी व माचिस का कम से कम रोजाना का खर्च 10/- रु माने, तो एक महिने में 300/- रु सालभर में 3,600/- रु होते है। 50 वर्ष का हिसाब लगावें तो 1,80,000/- रु फिजूल खर्च में राख हो जाते है तथा कैंसर को न्योता! देते है।
:- गुजरात में तम्बाकू व गूटखे के सेवन से 32 हजार व्यक्ति हर वर्ष मरते है, कारण है, कैंसर।
:- अकेले भारत में एक दिन में 11 करोड़ की सिगरेट पी जाते है। इस तरह एक वर्ष में 50 अरब रु का धुंआ हो जाता है तथा कैंसर को निमंत्रण !
ये कैसी विडम्बना है कि सामाजिक हितो से सम्बन्धित तमाम मुद्दो व उससे जुड़े नकारात्मक प्रभावो पर हमारी सरकारे व सामाजिक सँगठन बहुत जोर शोर से आवाज उठाते हुए कुछ मसलो पर आन्दोलन तक छेड़ देते है परन्तु आये दिन इस तरह की होने वाली घटनाओ पर कभी भी कोई सामाजिक संगठन या राजनीतिक दल न आवाज उठाते है और न ही इस गम्भीर समस्या के निदान की ब्रहद स्तर पर कोई पहल करते है। कुछ जागरुक व जिम्मेवार नागरिक स्थानीय स्तर पर कही कही कुछ थोड़े प्रयास जरुर करते रहते है लेकिन वे इस बुराई को जड़ से मिटाने मे कभी भी पूर्ण समर्थ नही हो पाते।
सबसे पहले हमे शराब से होने वाले सामाजिक दुःष्प्रभाव व उससे होने वाले धन जन की हानि के विषय मे विचार करना चाहिए। शराब का सेवन विभिन्न प्रकार से समाज के विभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा किया जाता रहा है कुछ लोगों के लिए शराब का सेवन अपनी सोसाइटी मे दिखावे के लिए किया जाता है ऐसे लोग अच्छे ब्राण्ड की शराब का सेवन करते है तथा दिन मे किसी एक समय या फिर कभी कभी कुछ अवसरों पर करते है। आर्थिक रुप से सुद्रढ़ ये वर्ग सिर्फ मौज मस्ती के लिए ऐसा करते है। मध्यमवर्गीय व निम्नवर्गीय लोगों के लिए मधपान करने के अनेको कारण होते है, जिनके विषय मे प्रायः हम सभी जानते है कुछ लोग शौकिया पीने लगते है तो कुछ लोग संगत के असर से। कुछ लोग सीमित व सँतुलित रहते हुए समाज मे अपनी इस आदत को छिपाये रखते है तो कुछ लोग अतिरेकता मे बहकते हुए स्वच्छन्द हो जाते है ऐसे लोग एक बार जब सामाजिक मर्यादा की सीमाओ का उल्लघन कर देते है तो फिर वे समाज की मुख्यधारा से कटते चले जाते है।
शौकिया तौर पर लती हुए लोग जब आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते है तो स्थिति भयावह रुप ले लेती है खुद का रोजगार तो प्रभावित होता ही है प्राइवेट फाइनेन्सरो के जाल मे फँस कर कर्जदार तक हो जाते है और तब उनका ये शराब रुपी नशे का “रोग ” गम, उलझन व परेशानी से मुक्ति पाने की “दवा” भी बन जाता है। इस अवस्था मे ऐसे लोग गहरे अँधियारे मे धँसते चले जाते है। उन्हे शराब मे ही हर समस्या का समाधान दिखायी देता है। ऐसे मुश्किल क्षणो मे जब कोई करीबी उन्हे समझाने बुझाने व सुधारने के अतिरिक्त प्रयास करता है तो अक्सर उन्नाव जैसी घटना हो जाती है।
ऐसे लोगो पर समाज का दखल व असर नही होता क्योकि अक्सर लोगो के समझाने पर ये लोग सिर्फ एक ही जुमले का प्रयोग करते है ,” तुम्हारे बाप का पीते है क्या ” और तब हर स्वाभिमानी व्‍यक्ति ऐसे लोगो से दूर रहने मे ही अपनी भलाई समझता है। इन परिस्थितयो मे भुक्तभोगी परिवार पूरे समाज से अलग थलग पड़ जाता है कोई उनका दुःख सुनने वाला नही होता। निकट रिश्तेदार आखिर कितने दिनो तक करीब रहते हुए उनकी मदद कर सकते है।
सबसे खराब स्थिति उन बच्चो की होती है जो बालिग नही होते, माँ बाप की रोज की किच किच का उनके अर्न्तमन मे बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है ,ऐसे बच्चे मानसिक रुप से अन्य बच्चो की अपेक्षा पिछड़ जाते है घर का अच्छा माहौल न मिलने से उनमे दब्बूपन आ जाता है और वे हमेशा डरे डरे से रहते है अपने सहपाठियो से खुलकर बात नही कर पाते शिक्षक के समक्ष अपरोधबोध से ग्रसित व सहमे सहमे रहते है एक अँजान डर के कारण पढ़ा लिखा कुछ भी पल्ले नही पड़ता, हम हमारा समाज व सरकारे क्या कभी ऐसे लोगो के दुःख दर्द व मानवाधिकार से सम्बन्धित विषयो पर गौर करता है या फिर गौर करेगा ?
मेरा तो शाशन और प्रशाशन से ये अनुरोध है कि आखिर हम पूर्ण शराब बँदी क्यो नही लागू करते, जिस वस्तु से हमारा समाज दिन प्रतिदिन विषैला होता जा रहा हो उसका क्यो न हम पूर्ण तिलाँजलि कर दे कुछ गरीब परिवारो की जड़ो को खोखला करके हम अमीरो को और अमीर करके क्या हासिल करना चाहते है। अमीर व सँम्पन्न लोग ऐसा नशा खुद की कमाई से न करके इधर उधर के पैसो से करते है जब कि आम आदमी अपने खून पसीने के पैसो व उसके पश्चात जर जमीन बेँच कर नशा करते है और जब वह भी नही होता तो आम नागरिको के यहाँ लूटपाट करके समाज मे और विषम स्थिति पैदा करते रहते है।
किसी भी तरह के नशे से मुक्ति के लिए सिर्फ एक ही उपाय है वह है संयम वैसे तो संयम कई समस्याओं का समाधान है लेकिन जहां तक नशामुक्ति का सवाल है संयम से बेहतर और कोई दूसरा विकल्प नहीं है हाँ सेल्फ मोटिवेशन भी नशामुक्ति में बेहद कारगर है या फिर किसी को मोटिवेट करके या किसी के द्वारा मोटिवेट होके भी नशे से मुक्त हुआ जा सकता है लेकिन यदि तम्बाकू का नशा करने वाला यदि संयम अपनाए तो इस पर जीत हासिल कर सकता है जब कभी तम्बाकू का सेवन करने की तीव्र इच्छा हो तो संयम के साथ अपना ध्यान किसी अन्य काम में लगा लें ज़्यादातर तम्बाकू को भुलाने की कोशिश करें वास्तव में यदि व्यक्ति हितों के प्रति जागरुक हैं तो वह किसी भी नशे की चपेट में आ ही नहीं सकता और यदि आ भी जाए तो थोडा सा संयम और सेल्फ मोटिवेशन उसे इस धीमे ज़हर से मुक्त कर सकता है। तम्बाकू और इसके घातक परिणामो से हम अपने करीबी और अपने मित्रों को परिचित करायें यदि कोई आपका करीबी तम्बाकू या किसी नशे की लत का शिकार है तो उसे मोटिवेट करके उसे संयम का रास्ता बताएं और नशे से मुक्त होने में उसकी मदद करें।
व्यसनों से मुक्ति पाने के लिए नशे करने वाले साथियों से अधिक से अधिक दूर रहें।, मेहमानों का स्वागत नशे से न करें। घर में या जेब में बीड़ी-सिगरेट न रखें।, बच्चों के हाथ बाजार से नशीली वस्तुएं न मंगवाएं, स्वयं को किसी न किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त रखें।, इसके अपने दोस्तों और पारिवारिक डॉक्टर की भी मदद लें।, नशे से जुड़ी चीजों को दूर रखें। सबसे खास़ बात इस धीमे जहर के सेवन न करने के प्रति खुद को मोटिवेट करें।
नशा नाश की जड़ है। नशा हर बुराई की जड़ है। इससे बचकर रहने में ही भलाई है। इन पदार्थों से छुटकारा दिलाने के लिए पीड़ित व्यक्तियों का उपचार आवश्यक है। इस दिशा में शासन के द्वारा जिला स्‍तर पर नशामुक्ति केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में मादक द्रव्य अथवा मादक पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों को छुटकारा दिलाने के लिए नि:शुल्क परामर्श सहित उपचार किए जाते हैं। राज्य सरकार द्वारा विभिन्न सूचना तंत्रों के माध्यम से नशापान के विरूध्द लोगों में जनजागरूकता लाई जा रही है। राज्य के विभिन्न महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थानों में नशा करने से होने वाले हानि को प्रदर्शित करते हुए होर्डिंग्स लगाए गए हैं। नशे के दुष्प्रभावों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए प्रदेश में जनसहभागिता से रैली, प्रदर्शनी, प्रतियोगिताओं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और परिचर्चा आदि के आयोजन के साथ ही नशे के दुष्परिणामों को दर्शाने वाली पाम्पलेट, ब्रोसर आदि वितरित किए जा रहे हैं। नशामुक्ति के लिए 30 जनवरी को नशामुक्ति संकल्प और शपथ दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी प्रकार 31 मई अंतर्राष्ट्रीय धूम्रपान निषेध दिवस, 26 जून को ‘अन्तर्राष्ट्रीय नशा निवारण दिवस’, 2 से 8 अक्टूबर तक मद्यनिषेध सप्ताह और 18 दिसम्बर को मद्य निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है। पर नशे को जड़ से मिटाने के लिए हमें हर दिवस को नशामुक्ति दिवस के रूप में मनाना चाहिए।
नशा करने के नुकसान – After effects of addiction
नशा करने से लाभ कुछ नहीं होता लेकिन इसके नुकसान बहुत ज्यादा है। सिगरेट , बीड़ी , हुक्का , गुटका आदि में तम्बाकू होता है। जिसके उपयोग से क्षणिक फुर्ती व ताजगी का अनुभव होता है। शुरू में नुकसान दिखाई ना पड़ने के कारण इसका उपयोग बढ़ता चला जाता है। तम्बाकू के विषैले तत्व शरीर के लिए बहुत हानिकारक होते है। धीरे धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देते है। तम्बाकू के कारण कैंसर जैसा भयानक रोग हो जाता है। कई लोग तम्बाकू से कैंसर होने के कारण बर्बाद हो जाते है। शराब का नशा करना आजकल फैशन सा हो गया है। इसे आवभगत करने का साधन बना लिया गया है। भारत जैसे गर्म प्रदेशों में शराब का उपयोग बिल्कुल उपयुक्त नहीं है। ज्यादा सर्दी वाले देशों में थोड़ी मात्रा में इसका उपयोग सर्दी से बचाव कर सकता है। शराब का अधिक सेवन या गर्मी के मौसम में इसका उपयोग नुकसान देह ही होता है।
हमारा लीवर शराब को नहीं पचा पाता और रोग ग्रस्त हो जाता है। जिसके कारण बुखार , घबराहट , उल्टी , पेटदर्द हो सकते है। भूख बंद हो जाती है। इसके अलावा शराब से दिमागी शक्ति व स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है । नींद नहीं आती या डिस्टर्ब हो जाती है। शरीर का तापमान बनाये रखने की प्रणाली पर बुरा असर पड़ता है। शराब से दिल की धड़कन असामान्य हो जाती है। इससे साँस लेने में तकलीफ व थकान की समस्या भी हो सकती है।
इसी प्रकार हर प्रकार के नशे का शरीर पर बुरा असर ही होता है। नशा करने वाले सभी लोग जानते है की एक दिन नशा करने का गम्भीर परिणाम भुगतना पड़ेगा। नशा करना छोड़ना भी चाहते है। लेकिन छोड़ नहीं पाते। शारीरिक , मानसिक और आर्थिक रूप से बहुत परेशान होने के कारण नशा जिंदगी का अभिशाप बन जाता है। कुछ लोग तो इसके कारण आत्महत्या जैसा संगीन कदम भी उठा लेते है।
शराब के अन्य घातक प्रभाव
हालांकि शराब आप को खुशी की भावना और होश दे सकता है, दवा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की प्रतिक्रियाओं को धीमा कर सकता है, और अंततः नशे के दौरान मूर्च्छा , एक व्यक्ति का रक्तचाप, नाड़ी, संचार और नर्वस सिस्टम के रूप में और श्वसन में कमी आती है. यदि आप थके हुए हैं और शराब पीते है, तब यह और भी हानिकारक हो सकता है और यह आपकी मौत का कारण भी बन सकता है. इससे शरीर की बीमारी बढ जाती है और बीमारी से लड़ने की क्षमता कमजोर पढ़ जाती है. शराब में अवशोषण और खून में पोषक पदार्थों की कमी हो जाती है. इसलिए हमारा आपको सुझाव है की यदि आपको किसी प्रकार के नशे की आदत है तो तुरंत ही उसे छोड़ दे अन्यथा आप कई और बुरे रोगों में ग्रस्त हो सकते हैं तथा इसकी लत अधिक हो जाने के कारन आपको गुर्दे का कैंसर तथा आपको मौत का सामना भी करना पड़ सकता है! भारी शराब की खपत पर प्रतिकूल अपने शरीर में हर अंग को प्रभावित कर सकते हैं. वहाँ एक बहुत ही बीमारियों और विकारों भारी पीने के साथ जुड़ा की लंबी सूची है, और उनमें से कुछ हैं :
गुप्तांगो से ख़ून का बहाव
उच्च रक्तचाप
हृदय रोग
हैपेटाइटिस
पेट, मुख, स्तन, जिगर आदि का कैंसर
रक्ताल्पता
अस्थि मज्जा दमन
अल्सर
अग्नाशयी
यौन रोग
नींद का न आना
आज हमारे सामने एक सबसे बड़ी सामाजिक समस्या पैदा हो रही है, युवाओं के नशे का शिकार होना. जो कल के होने वाले देश के जांबाज कर्णधार हैं आज वही सबसे ज्यादा नशे के शिकार हैं. जिनको देश की उन्नति में अपनी उर्जा लगानी थी वो आज अपनी अनमोल शारीरिक और मानसिक उर्जा चोरी, लूट-पाट और मर्डर जैसी सामाजिक कुरीतिओं में नष्ट कर रहे है.आज का ९० प्रतिशत युवा नशे का शिकार है. जिस तरह से टेक्नोलाजी विकसित हुई है, ठीक उसी तरह से नशे के सेवन में भी नई टेक्नोलाजी विकसित हुई है.
आज का युवा शराब और हेरोइन जैसे मादक पदार्थो का नशा नहीं बल्कि कुछ दवाओं का इस्तेमाल नशे के रूप में कर रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस तरह की दवाएं आसानी से युवाओं की पहुँच में हैं और इनके सेवन से घर या समाज में किसी को एहसास भी नहीं होता कि इस व्यक्ति ने किसी मादक पदार्थ का सेवन किया है. इस बुराई के सबसे बड़े जिम्मेदार सिर्फ हम और आप है. आज की चकाचौंध भरी जिंदगी में हम इतने स्वार्थी हो गए हैं कि हमे यहाँ तक ख्याल नहीं रहता कि हमारा बच्चा किस रास्ते पर जा रहा है, क्या कर रहा है कोई परवाह नहीं. बस बच्चे कि ख्वाहिशें पूरी करते जा रहे हैं.
आज हमे पैसे कि लालच ने इतना अंधा कर दिया है कि हम सामाजिक बुराइयों को जन्म देने में जरा भी नहीं हिचकते. जिस व्यवसाय को लोग समाज में सबसे पूज्यनीय मानते थे वही आज इस बुराई को जन्म दे रहे हैं. जिन दवाओं को बिना डॉक्टर के पर्चे के नहीं मिलना चाहिए आज वही दवाएं धड़ल्ले से बिना पर्चे के और और कई गुना रेट पर मिल रही हैं. यहाँ तक कि ये दवाएं बनिए कि दुकानों पर भी मिल जाती हैं, जिससे युवा आसानी से उसका सेवन करते हैं. समाज के इस सबसे बड़ी बुराई को दूर करने के लिए सबसे पहले हमे जागरूक होना होगा फिर प्रशासन को. हमे लालच जैसी लाइलाज बीमारी को अपने अन्दर से निकल फेकना होगा, नहीं तो यह कुरीति धीरे-धीरे एक दिन हमें हमारे पुरे समाज को फिर हमारे इस पुरे सुन्दर भारत को खा जायेगा फिर हमारा दुनिया में कोई भी अस्तित्व नहीं रह जायेगा.
एक पूर्ण नशामुक्त व्यक्ति अपने परिवार, समाज एवं राष्ट्र की सर्वाधिक सेवा कर सकता है और राष्ट्र तथा समाज के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। अंत में नशा करने वालों से मेरी ये गुजारिश है कि अपने को छोड़कर एक अपने परिवार, माता, पिता, पत्नी और बच्चों का ख्याल रखते हुए ये सोचना होगा कि कल अगर आपको कुछ हो जाता है तो उनको कितना कष्ट होगा जो पूरी तरह आप पर ही आश्रित हैं। अगर आपको उनसे वास्तव में प्यार हैं। तो आपके परिवार वालों को ये न सुनना पड़े कि आप तो कुछ दिन के ही मेहमान हैं। आपका इलाज संभव नहीं है। आपके परिवार वाले डॉक्टर से पूछते हैं कि क्या ऑपरेशन से भी ठीक नहीं होगा ? तो डॉक्टर का जवाब आता है कि कहाँ-कहाँ ऑपरेशन करेंगे पूरा शरीर खोखला हो गया है। आइये प्रण करें कि जहाँ तक संभव होगा लोगों को नशे के सेवन करने से रोकेंगे। केवल और केवल व्‍यसन मुक्‍त व्‍यक्ति ही अच्‍छे समाज की रचना कर सकता है।
धर्म विचारों सज्जनों बनो धर्म के दास।
सच्चे मन से सभी जन त्यागो मदिरा मांस।।
नशा मुक्ति स्लोगन
1. हर दिल की अब ये है चाहत नशा मुक्त हो मेरा भारत।
2. ज्ञान हमें फैलाना है, नशे को मार भगाना है।
3. जब जागेगी ये आत्मा, होगा तभी नशे का खात्मा।
4. नशे को छोड़ो, रिश्ते जोड़ो।
5. नशा जो करता है इंसान कभी न उसका हो कल्याण, उसको त्यागें हैं सब प्राणी जल्द ही मिलता है श्मशान।
6. चारों तरफ है हाहाकार बंद नशे का हो बाजार।
7. ये जो बिगड़ी दिशा दशा है आज, नशे का सारा ये है काज।
8. कहीं न नशेड़ी दिखने पाये, नशा न अब यहाँ टिकने पाये।
9. उम्मीद न कोई आशा है अब चारों और निराशा है, बर्बाद तुम्हें ये कर देगा नशे की यही परिभाषा है।
10. दिल पे नशा ये भारी है, सबसे बड़ी बीमारी है।
11. यही संदेश सुबह और शाम, नशा मुक्त हो अब आवाम।
12. भारत की संस्कृति बचाओ अब तो नशे पर रोक लगाओ।
13. नशे की छोड़ो रीत सभी ख़ुशी के गाओ गीत सभी।
14. घर-घर में सबको जगाना है हमें देश इक नया बनाना है, हो जाये तंदरुस्त अब भारत नशे को दूर भगाना है।
15. नशेड़ियों के नशे भागो, नशेड़ियों को नहीं।
16. कुछ पल का नशा, सारी उम्र की सजा।
17. खुद बिगड़े हो तुम जो अब तो बच्चों को क्या सिखलाओगे, खुद जो करने लगे नशा हो उनको कैसे बचाओगे?
18. देख लो कैसा कलयुग आया माया में ही सब भ्रमित हैं, ऐसी नशे की लत ये देखो विष में दिखता अब अमृत है।
19. परिवार पर अपने दो अब ध्यान, नशे की लत का करो समाधान।
20. नशे की लत जो जारी है ये बहुत ही अत्याचारी है, मेले लगते हैं श्मशानो में आज इसकी तो कल उसकी बारी है।

रविवार, 22 जुलाई 2018

मां बाप के फैसलों का सम्मान करे......

एक बार ज़रूर पढ़े मैं जानता हूँ लोगों के पास फालतु का समय नहीं है, थोड़ा लम्बा है समय लगेगा पर मज़ा आएगा ?
एक लड़की की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ एक सिधे
साधे लड़के से की जाती है जिसके घर मे एक मां के आलावा
और कोई नहीं है।
दहेज मे लड़के को बहुत सारे उपहार और पैसे मिले होते हैं ।
लड़की किसी और लड़के से बेहद प्यार करती थी और लड़का
भी...Image may contain: 2 people, people sitting and people sleeping
लड़की शादी होके आ गयी अपने ससुराल...सुहागरात के
वक्त लड़का दूध लेके आता है तो दुल्हन सवाल पूछती है
अपने पति से...एक पत्नी की मर्जी के बिना पति उसको
हाथ लगाये तो उसे बलात्कार कहते है या हक?