धर्म क्या है?
वर्तमान धर्मों का स्वरूप देखा जाए तो कहीं पर भी मुझे धर्म जैसा नजर ही नहीं आता है।जहां ध्यान नहीं वहां धर्म नहीं है।एकाग्र होकर आधा घंटा अपने आप के अंदर झांकने का अस्तित्व नहीं वहां कैसा धर्म है!आधा घंटा शांतचित्त बैठकर अपनी चेतना को जगाने की कोई व्यवस्था नहीं,खुद से खुद का परिचय नहीं करवाया जा सकता वहां कौनसा धर्म होता है!धर्म प्रकृति का विकसित रूप होना चाहिए था!धर्म प्रकृति का सहभागी होना चाहिए था!